व्यंग्य

मत पूछो हम अपने आप को कितने हद तक सुधर रहे हैं।कसे नगोटा पहलवान सब , अखाड़े में उतर रहें हैं।।नहीं देखते अपनी औकात।करते बेईमान की बात।।सच का कम झूठ का ज्यादा, यहां पर मिलता रहता साथ,नीरछीर का विवेक खोकर सच्चाई से मुकर रहे हैं।।

कसे नगोटा पहलवान सब अखाड़े में उतर रहें हैं।-------

अपने दाव की बड़ी बड़ाई।मतलब की लता पेड़ चढ़ धाई।फूल आए या ना आए,फल दूर से पड़ा दिखाई।।घर में सेंध लगाने खातिर, अंदर खाने कुतर रहे हैं।।

कसे नगोटा पहलवान सब अखाड़े में उतर रहें हैं।।--------

अपने‌मन का गुल सब खिला रहे हैं।दिल मिले या ना मिले,हाथ तो अपना मिला रहे हैं।। 'सरस,कोई किसी से कम नहीं , अंदर ही अंदर  भुथर रहे हैं।।

कसे नगोटा पहलवान सब अखाड़े में उतर रहें हैं।।-------

गौरीशंकर पाण्डेय सरस