लखीमपुर खीरी से भाजपा के लिए संदेश

पिछले एक साल से देश में कृषि कानूनों को लेकर किसान अलग-अलग तरह से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। पंजाब में रेलवे ट्रैक पर धरना दिया, दिल्ली में सीमाओं पर आंदोलन जारी है, जगह-जगह किसान महापंचायतें हो रही हैं, सरकारी कार्यक्रमों का बहिष्कार हो रहा है, लेकिन सरकार इस विरोध को दूर करने और सुलह करने की जगह किसानों के दमन में लगी है। केंद्र सरकार ने किसानों से चर्चा बंद कर दी है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा तो एक समिति गठित की गई, ताकि इस गतिरोध का हल निकाला जा सके। जनवरी में गठित समिति ने मार्च में अपनी रिपोर्ट सौंप दी, लेकिन आज तक उसे सार्वजनिक नहीं किया गया है। इस बीच किसानों के कारण आवाजाही में हो रही तकलीफों की शिकायत भी अदालत में की गई। मानो रास्ता खुलवाकर देश में विकास के लिए नया प्रवेश मार्ग बना लिया जाएगा। किसानों के प्रदर्शन को देशविरोधी बताने की भी भरपूर कोशिशें हो गईं। 

हरियाणा में अगस्त में करनाल के तत्कालीन एडीएम आयुष सिन्हा का एक वीडियो वायरल हुआ था। जिसमें वे आंदोलनकारी किसानों के लिए सिर फोड़ दो, लठ्ठ मारना जैसे आदेश पुलिसकर्मियों को दे रहे थे। अब पिछले दिनों मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने एक कार्यक्रम में कहा कि हर इलाके से 1 हजार लठ्ठ वाले किसानों का इलाज करेंगे। इससे पहले गृहराज्य मंत्री अजय मिश्र ने किसानों के विरोध पर नाराजगी जताते हुए कहा था कि सुधर जाओ, वरना हम सुधार देंगे। और 3 अक्टूबर को जब उत्तरप्रदेश के लखीमपुर खीरी में अजय मिश्र के पैतृक गांव में होने वाले कार्यक्रम से पहले किसान काले झंडे लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, उस वक्त किसानों पर लठ्ठ नहीं चले, बल्कि उन पर गाड़ी ही चढ़ा दी गई। इस शर्मनाक और दुखद हादसे में कम से कम आठ लोगों की मौत हो गई।

मृतकों में किसान भी शामिल हैं और भाजपा समर्थक लोग भी। इस घटना के लिए अजय मिश्र के बेटे आशीष मिश्र को किसान जिम्मेदार बतला रहे हैं। हालांकि अजय मिश्र का कहना है कि घटनास्थल पर न उनका बेटा न कोई और परिजन मौजूद थे। बल्कि वे अराजक तत्वों पर पथराव का आरोप लगा रहे हैं और ये डर भी जतला रहे हैं कि अगर उनका बेटा वहां मौजूद रहता तो जिंदा नहीं बचता। मंत्री महोदय का यह डर उनके अपने राज्य की कानून व्यवस्था की व्याख्या कर देता है। बहरहाल, दिल्ली से लेकर करनाल और लखीमपुर तक किसान आंदोलन के खिलाफ इस क्रोनोलॉजी को समझना कठिन नहीं है। 

किसान चुपचाप सरकारी फरमान सुन लें, सिर और कंधे झुकाए खेती करें, मजबूरी में कर्ज लें और कर्ज न चुका पाने की सूरत में आत्महत्या कर लें। किसानों की इस तस्वीर से सरकार को कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन किसान विरोध की आवाज उठाएं, तो सरकार सबक सिखाने के तरीके ढूंढने लगती है। किसानों की दयनीय तस्वीर को चुनाव में भुनाते हुए ही 2014 में मोदीजी ने तंज कसा था कि शास्त्री जी कहते थे जय जवान, जय किसान। आज कांग्रेस पार्टी का नारा है मर जवान, मर किसान। 2014 में मोदीजी तो सत्ता पर बैठ गए, लेकिन जिस नारे को उन्होंने कांग्रेस के सिर मढ़ा था, आज वो उनके शासन की हकीकत बन गया है। किसान आंदोलन में अब तक 6 सौ से अधिक किसानों की जान जा चुकी है। 

लेकिन सरकार उनकी मांगें सुनने के लिए अपना सिर झुकाने तैयार नहीं है। लखीमपुर खीरी की घटना से एक बार फिर भाजपा शासन की हठधर्मी सामने आ गई। लेकिन इस घटना से भाजपा शासन की जड़ें भी उखड़ती दिख रही हैं। 1928 में लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध कर रहे शेरे पंजाब लाला लाजपत राय पर ब्रिटिश पुलिस ने बौखलाहट में लाठी चार्ज किया था। जिसमें लालाजी बुरी तरह घायल हुए थे। घायल लालाजी ने तब कहा था कि उनके शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी अंग्रेजी शासन के ताबूत में आखिरी कील साबित होगी। 

लालाजी के अल्फाज सच साबित हुए। अगर इतिहास सचमुच खुद को दोहराता है, तो लखीमपुर खीरी की घटना भी भाजपा शासन के लिए आखिरी कील साबित हो सकती है। उत्तर प्रदेश में अगले कुछ महीनों में चुनाव हैं, जिसमें किसान आंदोलन पहले से एक बड़ा मुद्दा था। अब इस घटना के बाद विपक्ष जिस तरह किसानों के पक्ष में खड़े हो चुका है, उससे योगी सरकार की परेशानियां बढ़ सकती हैं। गनीमत है कि सरकार ने मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजे का ऐलान किया, आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। लेकिन प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, भूपेश बघेल, चरणजीत सिंह चन्नी जैसे नेताओं को जिस तरह लखीमपुर खीरी जाने से रोका गया उससे यही संदेश निकल रहा है कि सरकार विपक्ष के तेवर से डर रही है। किसानों को अराजक बताकर इस घटना की जिम्मेदारी उन पर डालने की कोशिश भी हो रही है। 

अगर ऐसा है तो फिर विपक्ष के लोगों को जमीनी हकीकत देखने क्यों नहीं जाने दिया गया। वैसे लखीमपुर की घटना का असर उत्तरप्रदेश के साथ-साथ पंजाब और उत्तराखंड जैसे चुनावी राज्यों पर भी पड़ेगा। पंजाब में भाजपा पहले ही सत्ता में नहीं है और उप्र, उत्तराखंड में सत्ता बचाने की जद्दोजहद कर रही है। अब तक कोरोना कुप्रबंधन के कारण भाजपा सवालों के कटघरे में थी, अब किसान आंदोलन से उठ रहे अधिकारों, लोकतंत्र और मानवाधिकार के सवालों के जवाब भी भाजपा को देने होंगे। हिंदुत्व और राष्ट्रवादी नारों के शोर में बुनियादी सवालों को हर बार दबाया नहीं जा सकता।