पिजंर रीमा ठाकुर

हम एक सिक्के के दो पहलू,

क्या तेरा है ,क्या मेरा है!

क्यू भटकाता मन को वन्दे,

सब यही धरा रह जाना है!!


जितना जीना है, खुलकर जी "

हर बार कहाँ, जीवन मिलना!

फिर अहम् भरे पल क्यू जीता,

सब छोड़ यही पर जाना है!!


क्या तेरा है , क्या मैरा है,

नश्वर से है, सारे बंधन!

पंच तत्व से मिश्रित मिट्टी तन,

फिर मिट्टी में मिल जाना है!!


किस बात का है, अब अंहकार,

धन दौलत, वैभव माया का!

है, कपटी मन मोह माया,

हर वक़्त छला तू जाऐंगे!!


नजरे फेरेगें, वही लोग,

जो अब तक, तेरे हितैषी हैं!

अब स्वयं विवेक से चितंन कर,

जब पिजंर ही रह जाऐगा!!


श्रीमती रीमा महेंद्र ठाकुर,

रानापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत