तब कुल्हाड़ियाँ अपने आप हार जायेंगी...

               कहते हैं रिश्ते और पतंगों का ज्यादा ऊँचा उठना अच्छा नहीं होता। कटने का खतरा हमेशा बना रहता है। उसी तरह पेड़ों की घनी छाया किसी को भाए न भाए, उस पर विकास के नाम पर मिटाने का साया हमेशा मंडराता रहता है। साये के हाथ नहीं होते लेकिन हाथ वालों से ज्यादा दबोचते हैं। आज मेरा मित्र कट गया। बड़ी बेरहमी से। सत्रह साल की दोस्ती में उसने कभी अल्पविराम नहीं लगाया। स्वार्थियों के दलदल में निस्वार्थ कुसुम बनकर अपनी छटा बिखेरता रहा। आज उस पर पूर्णविराम लगा दिया गया। बताया गया कि वह विकास के आड़े आ रहा था। वहाँ मधुशाला की दुकान जो लगानी थी! पिताजी अक्सर कहा करते थे मन करे तो लिपट जाना उससे। वह क्या है न कि उसके हाथ में इंसानों की तरह कुल्हाड़ी नहीं होती। वह सिर्फ गले लगाना, प्यार बांटना और खुश रखने जैसा दुनिया का सबसे मुश्किल काम करता है। यह सब के बस की बात नहीं है। 

               मैं जागरूक था। मैंने वन विभाग के हेल्पलाइन नंबर पर फोन लगाया। मेरे मित्र के कटने की सूचना दी। वे आए । काटने वालों पर कुछ गंभीरता दिखाई। पता चला कि गंभीरता की मात्रा जितनी अधिक होती है सामने वाले की जेब उतनी ढीली होती है। मामला ले-देकर रफा-दफा हुआ। उसे टुकड़ों-टुकड़ों में काटकर मेरी आँखों के सामने से ले जाया गया। मैं देखता रह गया। आँखें छलक उठीं। जिन्हें मैं टुकड़े कह रहा था वह मेरी यादों का विशाल सागर है। उन टुकड़ों में मेरे झूले की टहनी है। बेफिक्र होकर सोने की छाया है। भूख मिटाने वाले फलों की टंगनी जैसी शाखाएँ हैं।

               घर पहुँचकर उसी की यादों में बहुत देर तक मेज पर सिर टिकाए सोचता रहा। अचानक से मेज बोल उठी – वह तुझसे दूर जरूर गया है, लेकिन अपनी बिरादरी के रूप में मुझे छोड़ गया है। मुझ पर रखी किताबों से अपने ज्ञान का इतना विकास करो कि पेड़ों को कटने और टुकड़े होने से बचा सको। कुछ ऐसा करो कि मैं जमीन पर नहीं लोगों के दिल पर उगूँ। तब कुल्हाड़ियाँ अपने आप हार जायेंगी।      

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, चरवाणीः 7386578657