मन था कोमल कलिका

मन था कोमल कलिका जैसा

कांँटों को हार बनाया।

सबको अपना समझा हमने

समझा नहीं कोई पराया।

कभी धूप में कभी छाँव में

कभी शहर और कभी गांँव में

ऊंची नीची सब राहों पर

हमनें खुद  कदम बढ़ाया

अंधकार में कोरस गाकर

खुद अपना दिल बहलाया।

सुख-दुख जो भी आन मिले

हर्षित होकर गले लगाया ।

सुख भी अपना दुख भी अपना

जीवन की चौसर पर देखो

घमासान हमनें टरकाया

जीते  तो मन इठलाया

स्वर्णमयी प्रभात हमारा

और अंधकार भी हमारा

अब चिंता सब दूर हुई हूं

वह हमारा, यह भी हमारा

वीनू शर्मा

जयपुर राजस्थान