जीना पड़ेगा जानम तेरे बिन

जीना पड़ेगा जानम

तेरे बिन अब तन्हा मुझे

मिल के चली जा इस बार

नहीं बुलाऊंगा,फिर कभी तुझे--2


खामोश है निगाहें

दीख रही वो शून्य में

छोड़ गई तु कैसे

थी अपने धुन में

क्या थी खता मेरी

मुझको बता जाती

करता कोशिश मैं

शायद कोई राह सुझे

जीना पड़ेगा जानम तेरे बिन......2


है राह जिंदगी के कैसे

हर मोड़ पे बिछे हैं कांटे

तेरे बिन तन्हा होकर

कैसे काटी मैंने रातें

जाना ही था तुझको

कुछ दिन की होती सब्र

जिंदगी के राह में तुम

खोद गई तू मेरा कब्र

असां नहीं था डगर

दियाआश का,जाने कब बुझे

जीना पड़ेगा जानम तेरे बिन.......2


करूंगा कोशिश

काट लें सफर अपना

तय करूंगा मैं राह

पूरा करेंगे ये सपना

फिदा होकर की थी तुने

मुझ पे इश्क की वारिशें

कि इक भूल यूं छोटी सी

मिटा गई मेरी सारी ख्वाहिशें

निकल गया मैं भी यूं

वगैर सोचे,समझे-बुझे

जीना पड़ेगा जानम तेरे बिन.........2


जीना पड़ेगा जानम

तेरे बिन अब तन्हा मुझे

मिल के चली जा इस बार

नहीं बुलाऊंगा,फिर कभी तुझे......2

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सम्पर्क सूत्र........

राजेंद्र कुमार सिंह

मेट्रो जोन,नाशिक-09,ईमेल: rajendrakumarsingh4@gmail.com