स्वप्न सलोना

छत के ऊपर नील गगन में 

स्वप्न सलोना पलता है।

चंदा शीतलता देता है, 

सूरज रोज ही ढलता है।

धरती मां अपनी धुरी पर 

चक्कर यों लगाती है।

सतत निरंतर अथक प्रयास से 

समय का पहिया घुमाती है।

रात और दिन की टिक टिक 

से ही जीवन का रथ चलता है।

एक सूत्र में बंधे हुए हैं 

मालाओं के मोती हैं।

तमस दूर करने आई  

दीपक की ही ज्योति है।

हो मन में अंधेरा या उजियारा 

कर्म सभी का फलता है।

सूक्ष्मजीव है हम सब 

इसमें संघर्षों का पहरा है।

और साथ हमारे आशाओं का 

रंग चढ़ा सुनहरा है।

यात्रा सुख हो या हो दुख के 

वक्त कभी नहीं टलता है।

छत के ऊपर नील गगन में 

स्वप्न सलोना पलता है।

प्रणाली श्रीवास्तव

शहडोल मध्यप्रदेश