अष्टमी

मिसेज वर्मा नवरात्रि के अष्टमी को नौ कन्या को अवश्य पूजती थी, उनमें देवी को विराजमान पाती थी। कोरोना के बाद से सोसाइटी में कोई भी अपनी बच्चियों को भेजना नही चाहते थे। चिंतामग्न बैठी थी, एकाएक अपने श्रीमान जी को बोली, "गाड़ी निकालिए, कहीं जाना है।"

चल दिये, दोनो, उन्होंने एक अनाथाश्रम के सामने गाड़ी रुकवाई। कुछ दिनों पहले सब सहेलियों के साथ बच्चो को फल देने आई थी।

अंदर जाकर सेक्रेटरी से बात की, "क्या हम कुछ छोटी बच्चियों को पूजा के लिए कल ले जा सकते हैं, मैं कागज़ में अपना फ्लैट नंबर, फ़ोन नंबर सब लिखकर आपको दे जाऊंगी, ये देखिए मेरा सोसाइटी का आई डी कार्ड है।"

सेक्रेटरी ने दस्तखत करा कर आज्ञा दी।

दूसरे दिन सबेरे मिस्टर वर्मा जाकर नौ कन्याओं को मास्क लगाकर घर लाये।

मिसेज वर्मा सबको देखकर बहुत प्रसन्न थी। जल्दी से चरण पखारे, नए वस्त्र लाकर रखे थे, सबको पहनाये। फिर आसन पर कन्याओं को विराजमान किया, पैरों में महावर लगाया, टीका लगाकर लाल चुनरी ओढ़ाई, 9 जोड़ी आंखे जिन्होंने बचपन हर अभाव में जिया, वो सम्मान और समान देखकर अचंभित थी। उनके चेहरे यूँ दमक रहे थे, जैसे देवीजी का वास हो। मिसेज वर्मा ने पूजा करी, सबकी आरती उतारी। फिर पूरी, चना, हलवा, खीर, फल मिठाई सबको परोसा, कुछ ने खाया, कुछ का डब्बे में पैक कर दिया। उनका मन सबको देखकर मंत्रमुग्ध था। अंत मे सबके चरण छूकर इक्यावन रुपये दिए और वर्मा जी से कहा, "जाइये सबको सकुशल आश्रम पहुँचाये।"

हंसते खेलते प्यारी बच्चियां चली गयी और मिसेज वर्मा उनकी फोटो फेसबुक में पोस्ट करने लगी।

स्वरचित

भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर