|| मन समंदर की लहरें ||

गांव से शहर की ओर पलायित आदमी अपनी पूरी जिन्दगी उस गांव की तिलिस्मी यादों में जीता है। ऐसा नहीं है कि गांव कोई आदर्श जीवनशैली देते हैं। गांव अक्सर आर्थिक अभावों और शैक्षिक गुणहीनता के पर्याय माने जाते हैं। गांवों में छोटी छोटी बेवकूफी भरी बातों को लेकर बेकार की दुश्मनियां और बदमाशियां कम नहीं होतीं। जब तब खानदान बन्द होता रहता है और फिर से शुरू होता रहता है। खेत, बाग, तालाब और आबादी के झगड़े भी कुछ कम नहीं हैं गांवों में। अभी भी शारीरिक स्वच्छता को लेकर गांवों में शहरों के मुकाबले कम सजगता है।

लेकिन कुछ जादू सा है उन्हीं गांवों के अस्तित्व में जो गांव से शहर आये आदमी को जिन्दगी भर बेचैन किये रहता है। वहां का आसमान याद आता है जो बादलों को इधर उधर पलटाता न जाने कहां कहां ले जाता था। आसमान कितना करीब लगता था और कितना अनंत। जमीन पर खेत की मेड़ों और चकरोड पर घास भी जैसे मदमाती महक से भरी होती थी। चकवड़ और मखार की झाड़ियां जैसे अपनापे का न्योता देती थीं। खेत किनारे की बगिया में बेवजह लोगों का पड़े रहना और कुछ भी बतियाते रहना सपने जैसा लगता है। घर के दुआर से लेकर खेत तक कितना कुछ काम फैला रहता था जिसे करते करते लगता था कि सारी दुनिया इसी परिधि में सिमट गई है।

सारी सामाजिकता का वास्तविक उत्स भी दुआर से हार-कछार में ही कहीं छिपा सा रहता था। बोलचाल बन्द होने के बावजूद शादी-ब्याह बरही-मुण्डन से लेकर तेरही बरखी तक आपसी सहयोग और मौकों की उपस्थिति आज भी यादों को गीला कर देती है।

शहर में गांव से पलायित आदमी आज भी विस्थापित और निर्वासित (और काफी हद तक एकाकी) जीवन जीता है और गांव का अनचीन्हा सा तिलिस्म उसे आखिर तक बेचैन किये रखता है।

प्रभाकर सिंह

प्रयागराज (उ. प्र.)