शरद का चाँद

धवल चांदनी छत पर आई,अमृत बरस रहा है।

रात पूर्णिमा शरद की आई,अमृत बरस रहा है।।


राह निहारी सबने तब ही,

प्रेम आज गदराया।

गगन आज बन गया सहायक,

नेह-सँदेशा लाया।।

मधुर मिलन की बेला आई,अमृत बरस रहा है।

रात पूर्णिमा शरद की आई,अमृत बरस रहा है।।


मादकता दिल में जागी है्

भावों का आवेग।

बाँहें हैं आतुर देने को,

आलिंगन का नेग।।

शुभ्र ज्योत्सना सबको भायी,अमृत बरस रहा है।

रात पूर्णिमा शरद की आई,अमृत बरस रहा है।।


महारास है यमुना तीरे,

 दो देहें अब एक।

मिलन-यामिनी करे प्रेम का,

आवेगित अभिषेक।।


चंद्रकिरण ने तान सुनाई,अमृत बरस रहा है।

रात पूर्णिमा शरद की आई,अमृत बरस रहा है।।


               प्रो.(डॉ)शरद नारायण खरे