टोटके

जैसे ही परिवार में लड़की बड़ी होते ही रिश्तों की तलाश होनी शुरू हो जाती हैं वैसे ही मीरा के लिए रिश्ते देखें जा रहे थे।सब के अपने अपने सूचन थे,उसकी मां की इच्छा थी उन्ही के गांव में या आसपास के गांव में लड़का मिले तो बेटी पास तो रहेगी।उसके पिताजी को लड़का अफसर चाहिए था,बुआजी के हिसाब से लड़का दिखने में सुंदर कद काठी वाला होना चाहिए।लेकिन मीरा को किसी ने नहीं पूछा कि वह क्या चाहती थी।काफी रिश्तों की बातें भी चल रही थी।

 और एकदिन मोहन का रिश्ता आया और सर्व सहमति से स्वीकार हो गया।हो भी क्यों नहीं! दिखने में अच्छा था, कदकाठी भी ठीक ही थी दोनों साथ में खड़े रहते थे तो एकदूसरे से बढ़कर ही दिखते थे। और सरकारी दफ्तर में बाबू भी लगा हुआ था,तनख्वाह भी अच्छी थी।फौरन रोका तो हो ही गया और सगाई का दिन भी तय हो गया। दोनों ने ही अपने अपने सपने  संजोए थे उन्हें साकार करने का समय पास में आ रहा था।खुशी खुशी दोनों शादी के दिन का इंतजार करने लगे।कभी कभार फोन पर भी बात कर लेते थे या कभी कोई रिश्तेदारों के घर कोई प्रसंग में  थोड़ी देर के लिए मिल भी लेते थे।

और खत्म हुई इंतजार की घड़ियां और आ गया शादी का दिन।मीरा सजधज कर अपने साजन के इंतजार में बैठी थी तभी लड़कियों की चिल्लाने की आवाज आई ,और वह समझ गई कि बारात आ गई हैं।पूरे बदन में सिहरन सी दौड़ गई और खुद से शरमा गई मीरा,और अपनी कल्पना में ही मोहन कैसा लगता होगा सोचने लगी। उसका मन करता था कि दौड़कर जाएं और लड़कियों के झुंड छिपकर अपने होने वाले स्वामी को देखें ,लेकिन शर्मीली मीरा नहीं उठ पाई मोहन को देखाने के लिए।

   शादी संपन्न हो गई और बिदाई की घड़ी आई, घर के सभी सदस्य जो शादी के काम में व्यस्त थे और ये दुखदाई पलों को भूल ही चुके थे , वे सभी विषाद से घिर गये ।अब घर की बेटी नहीं दिखेगी सुबह में जब नाश्ता परोसा जाएगा,नहीं उसकी खिलखिलाती हसीं सुनाई देगी।उसकी मां तो नीमबेहोश सी लग रही थी।लेकिन मोहन मीरा को पा कर खुश था।और ये दुखद पल भी बीत गए और मीरा अपने ससुराल पहुंच गई थी।और कुछ दिनों में ही सास ,ससुर,देवर नानंद का दिल जीत लिया था मीरा ने।

 ऐसे ही पांच साल गुजर गए लेकिन गोद हरी नहीं होने की वजह से मीरा उदास रहने लगी, हालांकि उस के घर वालें चाहे मन में सोचते होंगे बच्चे के बारे में किंतु कभी भी जाहिर नहीं करते थे सभी खुश ही थे।अब मीरा  देवी देवताओं की पूजा अर्चना करने की और मंदिर जा मिन्नते मान ने और धर्म ध्यान में मन लगाने लगी किंतु नसीब था की कुछ परिणाम ही नहीं आते बनता था।  जब मायूस हो गई तो मीरा, अब डोरे धागों में उलझने लगी, कहीं से तावीज लाती थी तो कई जगहों पर पैदल जाती थी दर्शन करने के लिए।ऐसे ही फिर साल निकल गया।और मायूसी ने घेर लिया था मीरा को,उदास सी रहने लगी तो उसकी सास ने उसे थोड़े समय के लिए मायके भेजा कि मन  थोड़ा ठीक हो जायेगा।घर आ मां से लिपट कर खूब रोई और अपने मन की बात बताई, अब उससे सहन नहीं हो रहा था ये कुदरत का जुल्म।वह अपने आप को दोषित मान रही थी और आत्मग्लानी से भर गई थी।उसकी मां  ने भी सांत्वना दी और ईश्वर पर भरोसा रखने के लिए बोला।कुछ दिन बाद अपनी सहेली के घर गई तो उसके घर उसकी पड़ोसन बैठी हुई थी।जब उसे पता चला तो उसने काफी टोटके बताए।जिसमे एक था कि किसी बच्चे को गर्म चिमटे से दाग दिया जाए तो उसके नसीब में बच्चा आ सकता हैं।और आशान्वित हो उठी वह,किंतु उदास भी थी कि कैसे किसी मासूम को दाग दे सकता हैं कोई।

  घर आई और बात दिमाग से निकल सी गई।दूसरे दिन खाना बना रही थी और उसकी प्यारी गुड्डू आई।उसके मायके आने के दिन से ही उनके पड़ोस में रहने वाली शारदा चाची की पोती  हर वक्त उसके आगे पीछे फिर रही थी और खूब प्यार दे रही थी उसे।गुड्डू के साथ उसका भी दिल लगा रहता था।वह उसके बाल बनाती,अच्छे कपड़े पहना के  खेलने ले जाया करती थी।मीरा की मां के बाद शायद वही थी जिससे उसका दिल लगा रहता था।

वह खाना बनाते बनाते  प्लेटफार्म की दूसरी और उसे बैठा के बाते करते करते खाना बनाया करती थी।आज भी उसे बैठाया और अपना काम कर रही थी कि उसे अपनी सहेली की पड़ोसन की बात याद आई और पता नहीं किस खयाल में गैस पर चिमटा गरम कर उसके पैर पर दाग ने के लिए चिमटा ले उसके पास गई और एक हाथ से चिमटा पकड़ा और दूसरे हाथ से उसका पैर पकड़ा।लगता था बच्चे की चाह में उसका दिमाग ही खराब हो गया था ।किंतु वह एकदम से चिल्लाई और देखा था गुड्डू के पैर के बदले उसने अपने ही हाथ को दाग दिया था।वह दर्द से चिल्ला उठी और आंखों से आंसू की धारे बहने लगी।और एक और से खुशी के भी आंसू थे ,भगवान का शुक्र था की बच्ची को दागा नहीं था।कैसे सहती वह मासूम इतना दर्द जिसे सहना उसके लिए भी मुश्किल था।अपना हाथ जलने के दुःख से ज्यादा गुड्डू का पांव बचने की खुशी थी उसे।

उसकी मां ने आकर उसे थोड़ा डांटा और सावधानी से काम करने के लिए सलाह भी दी डाली।दवाई लगा वह चली गई।गुड्डू उसका जख्म देख रुआंसी हो बैठी थी और भरी भरी आंखों से मीरा की और देख रही थी।मीरा ने उसे गले लगाया और मन ही मन उससे माफी मांग रही थी।उसने सोच लिया था कि अगर नसीब में होगा तो भगवान ही उसे बच्चा दे देंगे,अब कोई भी बेवकूफी उसकी तरफ से नहीं होगी।ये निर्णय ले वह तृप्त हो गई और गुड्डू को उसके घर छोड़ आई और अपने हाथ का दर्द भूल चैन की नींद सो गई।


जयश्री बिरमी

अहमदाबाद