मायका

बहुत सोच विचार के बाद रजनी और मयंक ने अपने छोटे से शहर का मकान बेचने का मन बना ही लिया था, वो तो बड़े शहर में आकर व्यवस्थित हो गए थे। मम्मी बहुत पहले स्वर्ग सिधार गयी थी, पापा दो महीने पहले सबको छोड़कर जा चुके थे।

प्लान करके रजनी अपने सूने से मायके के घर पहुँच तो गयी, पर मन मे तूफान मच गया, तूफान के बाद बारिश तो निश्चित ही आनी थी। बाहर का गेट खोलते ही पग पग पर लगा कोई अगवानी कर रहा, कोई गले लग रहा, बेटी आओ। जैसे ही कुछ अंदर घुसी, पापा की आराम कुर्सी, जिसमे वो बैठकर हमेशा किताबे पढ़ते थे, हवा से हिल रही थी, जाकर उसको और झुलाते हुए बिलख पड़ी रजनी। मयंक ने कहा, "संभालो स्वयं को रजनी, मानता हूं भावनाएं जुड़ी है यहां के चप्पे चप्पे से, पर अब हम क्या कर सकते हैं।"

पापा का प्रत्येक समान अपनी जगह फौजी स्टाइल में सलामी दी रहा था, उनको हमेशा से हर वस्तु जगह पर ही देखने की आदत थी और रजनी अपने अतीत में विचर रही थी। पापा चाहते थे, इस घर मे विद्यार्थियों की कोचिंग हो, ये विद्या का मंदिर हमेशा रहे।

तभी पड़ोस के आकाश अंकल चाय नाश्ता लेकर आये, उनसे इस मुद्दे पर बात चली तो सकारात्मक आईडिया निकल आया। उन्होंने कहा, "मैं एक प्रोफेसर को जानता हूँ, उन्हें आप किराए पर दे दो, मैं और वो दोनो एक डील पर दस्तखत करके देंगे, सबकुछ आपके नामपर होगा, आपको हर महीने ऑनलाइन किराया मिलेगा, पर ये बेचो मत।"

रजनी के मन की बात हो गयी।

मयंक ने कहा, "जैसी तुम्हारी इच्छा।"


स्वरचित

भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर





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