ख़ास दिनों का बढ़ता ट्रेंड

हर दिन को किसी विशेष नाम के रूप में मनाने का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है। व्यक्तिगत तौर पर मैं इस प्रचलन की सराहना नहीं करती परन्तु कभी-कभी मैं भी भेड़-चाल में शामिल हो जाती हूँ। इस ट्रेंड को बढ़ावा देने से ऐसा लगता है जैसे उस टॉपिक में पूरी दुनिया सिर्फ़ एक-दूसरे की देखा-देखी में आकर, बिना उस विषय की गम्भीरता को समझे सिर्फ़ औपचारिकता निभा रही है। जैसे ही वह दिन बीता और उस विषय को ठन्डे बस्ते में डाल दिया जाता है। पहले तो गिने-चुने कुछ ख़ास दिन व त्यौहार होते थे और लगभग सभी उस विशेष अवसर की पवित्रता, महत्ता और गरिमा का सम्मान करते थे। सबकी स्मृतियों में भी विद्यमान होते थे और बाकी दिन का कोई नामकरण नहीं किया जाता था। 

उदाहरण के लिए कहीं-कहीं देखने को मिला, आज 11 अक्टूबर को गर्ल चाइल्ड डे है, कल मेंटल हेल्थ डे था, कुछ दिन पहले ही बेटी दिवस था, महिला दिवस, मातृ दिवस, शाकाहारी दिवस, फोटोग्राफी दिवस और न जाने क्या क्या।  मुझे  कोई व्यक्तिगत कष्ट या चिढ़ नहीं लेकिन जब ट्रेंड चल रहा है और हम सामाजिक रूप से सक्रिय हैं लिहाजा प्रभाव पड़ना तो स्वाभाविक है। खैर इस पर भी काबू किया जा सकता है, कोई परेशानी नहीं परन्तु कलमकार होने के नाते मेरा फ़र्ज़ बनता है कि मैं आम नागरिक की प्रतिक्रिया को आवाम के समक्ष रखूं और मुझे यह सच्चाई बताते हुए खेद हो रहा है कि अधिकतर आम दिवसों, जिन्हें सोशल मीडिया में ख़ास दिवसों का नया-नया जामा पहना दिया गया है, उनका सिर्फ मज़ाक उड़ रहा है, मैंने प्रत्यक्ष सुना/देखा है ऐसे दिनों का उपहास उड़ाते व महज़ औपचारिकता निभाते। फिर बताइए उससे अच्छा तो साधारण दिनों को साधारण ही रहने दें, और देखा-देखी करके इस प्रचलन की श्रृंखला लम्बी न करें।

उदाहरण के लिए बेटी दिवस, गर्ल चाइल्ड डे, मदर्स डे, महिला दिवस सब मिलते जुलते से हैं। यह सब मनाने से क्या किसी का सम्मान बढ़ा, क्या बहुत बड़ा बदलाव आया? मुझे तो लगता है कि हमें (महिलाओं, बेटियों को) स्पेशल ट्रीट किया न किया जाये, बस बराबर समझा जाये और क्राइम बंद हो। पर इतनी अधिक औपचारिकता दिखाना और एक ही विषय पर विभिन्न हैशटैग लगाकर कई नाम देना, बचे-खुचे पवित्र भावनाओं को सतही बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं जो की बेहद चिंताजनक व दु:खद बात है, बाकी तो सभी स्वयं समझदार हैं। 

- शशि दीप 

मुंबई