बिज़ली और पेट्रोल डीज़ल के लिए एक राष्ट्र एक आवृत्ति एक मूल्य का स्वतः संज्ञान नीति निर्धारकों द्वारा लेना समय की मांग

गोंदिया - भारत में तीव्र गति से बढ़ते प्रौद्योगिकी के कारण और डिजिटलाइजेशन के चलते अनेक क्षेत्रों में अनेक कार्य अति आसान और सुलभ हो रहे हैं। सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात पारदर्शिता में तीव्रता से वृद्धि होने पर मिथ्या व्यवस्था और गड़बड़ियों में काफ़ी कमी होजाएगी जिसे हमारा लक्ष्य ज़ीरो करना है, तभी हमारा भारत और भारत का हर नागरिक सुख, समृद्धि, चैन और समानता की बारिश में भीगने में सफल होगा।...साथियों इतने तीव्र प्रौद्योगिक विकास और सफलताओं के बावजूद हम देखते हैं कि भारत में बिजली, पेट्रोल और डीज़ल सहित पेट्रोलियम पदार्थों जैसी प्राथमिक श्रेणी की आवश्यकताओं वाली वस्तुओं में भी कीमतें हर राज्य हर शहर में अलग-अलग है। 

हालांकि हम सब जानते हैं कि इसका प्रमुख कारण हर राज्य में लगने वाले वैट और केंद्र का सेस जिम्मेदार हैं। साथियों हम सकारात्मक पहलू से सोचें तो इस वैट और सेस के आधार पर ही केंद्र, राज्य सरकारें अपने-अपने प्रदेशों और केंद्रीय योजनाओं का क्रियान्वयन सफलतापूर्वक कर पाते हैं। क्योंकि इससे बड़ाआर्थिक  सृजन का क्षेत्र और कोई नहीं है हालांकि यह योजनाएं जन-जन हितार्थ ही होती है परंतु, साथियों मेरा मानना है कि हालांकि विकास की यह दीर्घकालीन योजनाएं भी ज़रूर है ताकि आने वाली पीढ़ियों तक इनका सकारात्मक लाभ हम उपलब्ध करा सकें।

परंतु वर्तमान प्रौद्योगिकी युग में नीति निर्धारकों और संबंधित मंत्रालय द्वारा स्वतःसंज्ञान लेकर एक राष्ट्र एक आवृत्ति एक मूल्य के मंत्र को साकार करने की ओर कदम तात्कालिक बढ़ाने का समय आ गया है। पिछले कुछ वर्षों से हम देख रहे हैं कि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने की पुरजोर मांग जनता से उठ रही है और हर जीएसटी काउंसिल मीटिंग में मुद्दा उठाने की तैयारी रहती है परंतु हो नहीं पाता।हालांकि इस बार भी 44 वीं जीएसटी की मीटिंग में मुद्दा उठाया गया पर सहमति नहीं बन पाई क्योंकि सभी राज्य भी इस कदम का विरोध करते हैैं क्योंकि उनको भी आर्थिक बैकलॉग का सवाल उत्पन्न होता है।

परंतु मेरा यह सुझाव है कि जिस तरह बिज़ली मंत्रालय व विभाग द्वारा उपभोक्ताओं के लिए बिज़ली की लागत को कम करने के लिए बाज़ार आधारित आर्थिक प्रेषण (एमबीईडी) का फार्मूला सृजित किया जिसमें राज्य सरकारों, विद्युत वितरण कंपनियों (डिस्कॉम), विद्युत विनियामक आयोग, राज्यों की उत्पादक कंपनियां, (जेन कोस) इत्यादि संबंधित लागत पक्षों की कार्यशाला आयोजित कर एमबीईडी के प्रथम चरण का कार्यान्वयन 1 अप्रैल 2022 से शुरू करने की योजना है जिसका लाभार्थियों को लागत में 5 फ़ीसदी कमी आने की संभावना है ठीक उसी तरह पेट्रोल डीजल की कीमतों में एक राष्ट्र एक आवृत्ति एक मूल्य का निर्धारण सभी संबंधित पक्षों द्वारा आपस में तालमेल स्थापित कर किया जा सकता है । 

 भले ही जीएसटी में पेट्रोल डीज़ल का शामिल करना अभी दूर की कौड़ी नज़र आ रहा है परंतु एक राष्ट्र एक आवृत्ति एक मूल्य की मांग का संभावना तुरंत लागू हो सकती है बस!!! जरूरत है ज़ज़्बे जांबाज़ी और हौसले की जो वर्तमान प्रशासन में कूट-कूट कर भरा महसूस हो रहा है!!!...साथियों बात अगर हम 8 अक्टूबर 2021 को पीआईबी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति की करें तो उसमें इस मंत्र को तालमेल से सटीक बैठाने की कोशिश बिजली मंत्रालय और विभाग द्वारा की गई है उनके अनुसार, विद्युत मंत्रालय ने बाजार आधारित आर्थिक प्रेषण (एमबीईडी) को लागू करने के लिए एक सहमति और चरणबद्ध दृष्टिकोण की आवश्यकता को पहचाना है । 

जिससे प्रतिभागियों, बिजली (पावर एक्सचेंजों) और प्रभार प्रेषण (लोड डिस्पैच) केंद्रों को धीरे-धीरे नई व्यवस्था के अनुकूल बनाने में सहायता मिलेगी। इस उद्देश्य से इसी वर्ष, 1 जून 2021 को विद्युत मंत्रालय द्वारा सभी संबंधित हितधारकों को उनके विचार और टिप्पणियां प्राप्त करने के लिए एक चर्चा नोट भेजा था। 6 जुलाई 2021 को विद्युत मंत्रालय द्वारा राज्य सरकारों को इस प्रक्रिया में शामिल (कवर) करने वाली एक परामर्श कार्यशाला भी आयोजित की गई थी। कार्यशाला के दौरान कई सुझाव प्राप्त हुए थे और जिन पर बाद में मंत्रालय द्वारा विचारविमर्श किया गया। 

इसके बाद फिर 26 अगस्त 2021 को विद्युत वितरण कम्पनियों (डिस्कॉम), विद्युत विनियामक आयोगों, राज्यों की उत्पादक कम्पनियों (जेनकोस) इत्यादि के साथ दूसरी परामर्श कार्यशाला आयोजित की गई। यह व्यापक रूप से स्वीकार्य तथ्य है कि बिजली बाजार के संचालन में सुधार और एक राष्ट्र, एक ग्रिड, एक आवृत्ति, एक मूल्य ढांचे की ओर बढ़ने में अब एक आवश्यक अगला कदम केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग (सीईआरसी) द्वारा शुरू किए गए बाजार आधारित आर्थिक प्रेषण (एमबीईडी) को आने वाले समय में लागू करना है। 

एमबीईडी यह सुनिश्चित करेगा कि देश भर में सबसे सस्ते उत्पादन के संसाधनों को समग्र प्रणाली की मांग को पूरा करने के लिए प्रयोग किया जाता रहा है और इस प्रकार यह व्वस्था वितरण कंपनियों और बिजली उत्पादकों दोनों के लिए ही एक जीत होगी और अंततः इससे बिजली उपभोक्ताओं को महत्वपूर्ण वार्षिक बचत भी होगी।विद्युत मंत्रालय ने चरणबद्ध दृष्टिकोण पर यह अनुभव किया कि सभी प्रमुख हितधारकों के बीच इस पर पर्याप्त समान विचार हैं कि बाजार आधारित आर्थिक प्रेषण (एमबीईडी) के चरण-1 को लागू करने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को अंतर्राज्यीय उत्पादन स्टेशनों की अनिवार्य भागीदारी के साथ शुरू किया जाए। अन्य क्षेत्रों के उत्पादन संयंत्र भी स्वैच्छिक आधार पर चरण-1 में भाग ले सकते हैं। एमबीईडी के प्रथम चरण का कार्यान्वयन आगामी 01 अप्रैल 2022 से शुरू करने की योजना है। इससे पहले केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग (सीईआरसी) अपने नियमों को संरेखित करेगा और इस व्यवस्था (सिस्टम) को सुचारू रूप से चलाने के लिए मॉक ड्रिल किया जाएगा।

विद्युत मंत्रालय उपभोक्ताओं के लिए बिजली की लागत कम करने के उद्देश्य से बिज़ली क्षेत्रमें प्रतिस्पर्धा बढ़ाने हेतु एक उपयुक्त तंत्र की जांच कर रहा है। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि बिजली और पेट्रोल डीजल के लिए एक राष्ट्र एक आवृत्ति एक मूल्यका स्वतःसंज्ञान नीति निर्धारकों द्वारा लेने का समय आ गया है जैसे बिजली विभाग द्वारा रणनीति अपनाई वैसी ही रणनीति पेट्रोल डीजल में अपनाने की रणनीति बनाने की जरूरत है।

-संकलनकर्ता लेखक- कर विशेषज्ञ एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र