आंखें

आंखों में आस सी है, 

ज़िंदगी क्यों निराश सी है, 

हम चाहते हैं कुछ यहां, 

पर न मिले तो उदास सी है। 


आंखों में ख्वाब सजे कितने, 

आसमान में तारे हो जितने, 

अनगिनत सपनों में, 

तारे क्यों लगते हैं टूटने। 


आंखों में सपने लिए, 

दहलीज पर ही खड़े रहे, 

आंखों में आंसू का समंदर, 

फिर भी हम हंसते रहे। 


आज इस मोड़ पर, 

फिर सपने सज रहे हैं, 

दहलीज पर हम खड़े, 

आंखों में सपने भर रहे हैं। 


दुनिया तो मेला है, 

आंखें कुछ ढूंढ रही, 

सपने जो सज रहे थे, 

शायद मिले यहीं कहीं।


आंखे सपने देखती रहे, 

ख्वाब ये सजते रहे, 

आशाओं के साथ हम, 

सपने अपने पूरे करें।


आंखों में भरी आस है, 

दृढ़ अब मेरा विश्वास है, 

सपने जरूर पूरे होंगे, 

ये जिंदगी अब बिंदास है। 


स्वरचित -अनामिका मिश्रा 

झारखंड, सरायकेला (जमशेदपुर)