दशहरा और मान्यताएँ

दशहरे के साथ अनेक परंपरागत विश्वास भी जुड़े हुए हैं। इस दिन राजा का दर्शन शुभ माना जाता है। इस दिन लोग ‘नीलकंठ’ के दर्शन करते हैं। गाँवों में इस दिन लोग जौ के अंकुर तोड़कर अपनी पगड़ी में खोंसते हैं। कुछ लोग इसे कानों और टोपियों में भी लगाते हैं। उत्तर भारत में दस दिनों तक श्रीराम की लीलाओं का मंचन होता है। विजयादशमी रामलीला का अंतिम दिन होता है। इस दिन रावण का वध किया जाता है तथा बड़ी धूमधाम से उसका पुतला जलाया जाता है।

कई स्थानों पर बड़े-बड़े मेले लगते हैं। राजस्थान में शक्ति-पूजा की जाती है। मिथिला और बंगाल में आश्विन शुक्लपक्ष में दुर्गा की पूजा होती है। मैसूर का दशहरा पर्व देखने लायक होता है। वहाँ इस दिन ‘चामुंडेश्वरी देवी’ के मंदिर की सजावट अनुपम होती है। महाराजा की सवारी निकलती है। प्रदर्शनी भी लगती है। यह पर्व सारे भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

दशहरे के अवसर पर क्षत्रिय अपने अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करते हैं। जिन घरों में घोड़ा होता है, वहाँ विजयादशमी के दिन उसे आँगन में लाया जाता है। इसके बाद उस घोड़े को विजयादशमी की परिक्रमा कराई जाती है और घर के पुरुष घोड़े पर सवार होते हैं। इस दिन तरह-तरह की चौकियाँ निकाली जाती हैं। ये चौकियाँ अत्यंत आकर्षक होती हैं। इन चौकियों को देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग टूट पड़ते हैं।

      सनातन धर्म में दशहरा के पर्व का विशेष महत्व है। इस पर्व पर लोग आपसी मतभेद भुलाकर भाईचारे की मिसाल पेश करते थे। लेकिन वर्तमान समय में यह परंपरा अब धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। अब न लोगों के लबों पर पान की लाली होती है और न ही लोग बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते नजर आते है। अब लोग दशहरे का महत्व बस इतना ही समझते है कि इस दिन झांकियां निकलेगी और रावण के पुतले का दहन होगा।

     दशहरा में एक दूसरे को पान न खिलाया जाए तो कुछ अधूरा सा लगता है। खासतौर से बुंदेलखंड में यह परंपरा प्राचीन समय से है, लेकिन आधुनिक परिवेश में व्यस्तता और गुटखा-सिगरेट के बढ़ते चलन के कारण यह प्राचीन परंपरा घरों से ही गुम हो गई है। स्मार्ट फोन के जमाने ने युवाओं को अपनी आगोश में ले लिया है और एक दूसरे के घर जाकर आशीर्वाद लेने की परंपराएं भी कम हो गई हैं।

     प्राचीन परंपराओं को निभाने में युवा पीढ़ी की रुचि कम ही दिखती है। हाईटेक युग में अब युवा एक दूसरे के घर जाने की जगह मोबाइल से एसएमएस व इंटरनेट से दशहरा का ई-कार्ड भेजना ही ज्यादा मुनासिब मानते है। वह एक दूसरे को एसएमएस से ही दशहरा की शुभकामनाएं दे देते है। 

      जो भी हो,दशहरे का पर्व सदा धार्मिक, सांस्कृतिक, सामरिक व सामाजिक महत्व रखता है।भले ही लोग व्यस्त हो गए हों,तो भी दशहरे का महत्व किसी भी प्रकार से कम नहीं हुआ है,न ही होगा।

                    -प्रो(डॉ)शरद नारायण खरे

                                  प्राचार्य