भूख की सच्चाई

घर पर कुछ मरम्मत का काम चल रहा था। दो चार मजदूर आए हुए थे। उन्हीं में से हरिया भी एक था। वह हर दिन अपने चार साल के बेटे के साथ आता था। मैं उसके बच्चे को कुछ खाने के लिए देने की कोशिश करता तो हरिया लेने से मना कर देता। कहता, “कुछ अच्छी आदतें जानलेवा होती हैं। अगर लड़के को अच्छी चीज़ों की लत लग गयी तो इसे पालना मेरे लिए दुश्वार हो जाएगा। मैं तो जीने को ही आदत मानता हूँ। इस आदत में शौक का तड़का बड़ा महंगा पड़ता है साहब!”

मैंने कहा, “तुम बेवजह में इतना घबराते हो। यह दुनिया बहुत बड़ी है। ऊपर वाला सबके लिए कुछ न कुछ इंतजाम करता है। जब संतान दी है तो पेट भी भरेगा।“ हरिया ने हँसते हुए कहा, “साहब ऐसी बातें सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं। काश इन बातों से पेट भी भर पाता। ऐसी बातें बोलने के लिए साहस की जरूरत नहीं पड़ती। साहस की जरूरत तो तब पड़ती है जब हाथ में पैसे न हों और भूखी संतान को बाजार से लेकर गुजरना हो। खरीदने से लाचार आदमी बाजार में बिकने वाली चीज़ों से भी सस्ता जान पड़ता है।”

साथी मजदूर से मालूम करने पर पता चला कि हरिया की पत्नी भुखमरी के चलते पिछले साल गुजर गयी। इकलौते लड़के की भूख मिटाने के लिए उसे घांस उबालकर खिलाने पर मजबूर होना पड़ा। लड़के से ज्यादा खुद खाता और लड़के को  यह अहसास दिलाता कि घांस दुनिया का सबसे अच्छा व्यंजन है। यह सुन मैं सहम गया। पहली बार अहसास हुआ कि भूख पर बात करना और भूख महसूस करना दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है।

आज मेरे पास हरिया के काम करने का आखरी दिन था। मैंने उसका मेहनताना देते हुए उत्सुकतावश पूछ लिया कि वह इन पैसों का क्या करेगा? इस पर उसने जो जवाब दिया वह समस्त मानव जाति के लिए करारा तमाचा था। उसने कहा – मैं दवाई की दुकान से ऐसी दवा खरीदूँगा जिससे भूख कम लगे। हो सके तो भूख ही न लगे, ऐसी कोई दवा। इतना कहता हुआ, वह चला गया। पहली बार मैं भूख के अहसास को हांड-मांस के आकार में मुझसे दूर जाते हुए देख रहा था। सच है, ए.सी. कमरों में भुखमरी मुद्दे की बैठकों के नाम पर जानवरों की तरह हमेशा खाते रहने वाले कुछ लोग कागज से भूख तो मिटा देते हैं, लेकिन असलियत में उन्हें अपनी खुराक के लिए जिंदा रखते हैं।        

 डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, चरवाणीः 7386578657