ख्वाहिशें कहाँ पूरी होती हैं

 चाहने भर से 

सपने संजोने से

उम्मीद की लौ मन में जगाने से

ख्वाहिशें कहाँ पूरी होती हैं

ये ज़िन्दगी है साहिब 

आज़माती है पग पग पर

बदल रंग पल पल 

कभी  तपिश

कभी नमी

कभी सुख का सावन

कभी दुःख की बदली

यूँ राह नहीं आसान

ख्वाहिशों की

देनी पड़ती है टक्कर

लड़ना पड़ता है

कभी खुद से

कभी अपनों से

कभी परायों से

कभी समाज से

कभी रीति रिवाजों से

ये ज़िन्दगी बड़ी कड़ी है साहिब

ख्वाहिशें कहाँ पूरी होती हैं

बस चाहने भर से

या पलकों में सपने गूँथने से।।

.....मीनाक्षी सुकुमारन

          नोएडा