बिन मेरे नही तुम मुकम्मल

मैं हूं नहीं अबला

हूँ तेरे जीवन का संबल

ना समझो मुझे अकेली

बिन मेरे नहीं तुम मुकम्मल।

तुम थे बस एक

तरल द्रव्य कण

रखा संजोकर मैंने

अपने हमल- महल में

दी तुझको अपने तन की

तरुणाई मैंने

खो अपनी लालिमा तुझे

लाली से सींचा

मिला तुझे अस्तित्व तेरा तब

और बनी यह काया निर्मल

बिन मेरे नहीं तुम मुकम्मल।

खो जाता व्योमेश

व्योम की गहराई में

बनी सारथी और दिया

उसको रश्मि- रथ

तब जाकर उभरा

अपने अंबर आंचल से

और बढ़ चला जगजीवन के

प्रगति पथ पर

बिन मेरे नहीं तुम मुकम्मल।

भूल जाता रास्ता भी

चांद खुद अंधियारे में

बन उसकी चांदनी तब

साथ मैंने ही दिया

बिखर जाता सागर सारा

उठ ना पाती कोई लहर

रत्नगर्भा रूप धर के

उसे रत्नाकर बना दिया

पाकर तब स्पर्श मेरा

हो सकी उसमें भी हलचल

बिन मेरे नहीं तुम मुकम्मल।

मैं जननी हूं तेरी

हूँ भगिनी भी तेरी

बन जीवनसंगिनी साथ जो दूं

हूँ जाया भी तेरी

मुझसे ही तू उत्पन्न हुआ

मुझ में ही डूब के पलता है

क्यों रखता है फिर मिथ्या दम्भ

और अहंकार को फलता है

अर्पित नैवेद्य नारायण को

हो पूर्ण पा के बस तुलसीदल

बिन मेरे नहीं तुम मुकम्मल।


महिमा तिवारी,रामपुर कारखाना,

देवरिया,उ0प्र0