मगर साथ अब मैं निभाऊंगा कैसे

नहीं चाहते बात उनसे करूं मैं

नहीं चाहते पास उनके रहूं मैं

बदल जाते हैं आजकल लोग ऐसे

करूं बात अब अपनेपन की मैं कैसे..।।


वही हैं जिन्हें दूर जाना नहीं था

कभी दूसरा घर बसाना नहीं था

मगर घर पुराना नहीं अब है भाता

बदल अब लिया है मकां देखो कैसे..।।


हुआ घोंसला प्रेम का अब वीराना

नहीं रास आता है अब गुनगुनाना

सूनी पड़ी प्रेम नगरी हमारी

इसे अब दुबारा बसाऊं मैं कैसे..।।


बदल सी गई प्रेम की रुपरेखा

नही था कभी उनका ये रूप देखा

भुलाना था आसान उनके लिए मैं

मगर उनको मैं भी भुलाऊंगा कैसे..।।


उन्हें थीं हमारी जरूरत यहीं तक

बनाया पथिक प्रेम पथ पर यहीं तक

निभाया सदा साथ उनका था मैंने

मगर साथ अब मैं निभाऊंगा कैसे..।।

मगर साथ अब मैं निभाऊंगा कैसे..।।


विजय कनौजिया

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