पुराना है तंत्र का शासन

पुराना है तंत्र शासन का

क्या करे इस आसन का

भूख नाचती सड़को पर

होठों पड़ी पपड़ी की गाथा

कब सुनती हैं सरकारें...!


लूट रहे जीवन को सब

नग्न नाच प्रत्यक्ष सम्मुख

अहो! अभी है सब विमुख

चित्कार उठी सूनें तम में

चीर घने भ्रष्ट तंत्र को...!


फहरा तिरंगा लाल किले!

संसद से उठ खड़े होकर

हर बार बार-बार कहेंगे

सबसे बड़ा प्रजातंत्र हमारा!


पर! क्या कहेंगे मंत्री-संतरी

सबसे भ्रष्ट तंत्र हमारा...!

चुसेंगे रक्त गरीबों का

पालने खुद के पेट को...!


भूखे मरती आँतों को लूटे

हर सिन्दूर की मांग लूटते

उठती,बिलबिलाती भूख सहारे

करेंगे हम तो शासन तंत्र में...!


परिचय - ज्ञानीचोर