सच्ची दोस्ती


सरगम पेशे से एक पत्रकार थी।उसे दिन भर इधर से उधर जाना पड़ता था। कब किस क्षेत्र में रिपोर्टिंग के लिए जाना पड़ जाए कुछ पता नहीं होता था ।घर परिवार में उसके सास-ससुर ,पति प्रखर एवं 4 साल की छोटी बच्ची नव्या थी। घर के कार्यों में सरगम अति निपुण थी  और सब की जरूरतों का पूरा पूरा ध्यान रखती थी। घर की एवं नौकरी की जिम्मेदारियों को निभाते निभाते वह स्वयं को लगभग भूल सा गई थी।सब कुछ सही चल रहा था ।वह अपने पारिवारिक एवं व्यवसायिक जीवन से पूर्ण रूप से संतुष्ट भी थी, परंतु कोरोना के प्रकोप से वह अपने परिवार को नहीं बचा पाई और हुआ यह कि प्रतिदिन रिपोर्टिंग के लिए घर से बाहर रहने की वजह से सरगम कोरोना संक्रमित हो गई और सरगम से संक्रमण पाकर घर के बाकी सदस्य भी कोरोना संक्रमित हो गए। उम्र अधिक होने के कारण उसके सास ससुर की हालत सीरियस हो गई और उन्हें सांस लेने में बहुत ज्यादा दिक्कत होने लगी जिसकी वजह से उन दोनों को अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा।सौभाग्यवश इस सबके बीच भी घर की सबसे छोटी सदस्या अर्थात सरगम की बेटी नव्या किसी प्रकार संक्रमण से बच गई ।परंतु सरगम को अब भीतर ही भीतर यह डर खाए जा रहा था कि उसकी बेटी भी बहुत जल्दी कोरोना की चपेट में आ ही जाएगी।


उन दिनों कोरोना इतनी बुरी तरह फैला हुआ था कि सभी लोग न केवल घरों से बाहर निकलने से कतरा रहे थे अपितु एक दूसरे से बात करने तक से भी बच रहे थे। सरगम का मायका ग्वालियर मध्यप्रदेश में था और सरगम दिल्ली में रहती थी ।कोरोना की वजह से रेलगाड़ी एवं हवाई जहाज यात्रा पर तब सरकार द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया था,इसलिए वह बच्ची को वहां अपनी मां के पास भी नहीं भेज सकती थी। सरगम को बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी बच्ची को कैसे कोरोना से दूर रखे।


दिल्ली में ही सरगम की एक खास सहेली दिव्या भी रहती थी। सरगम का घर दिव्या के घर से कुछ 2 किलोमीटर की दूरी पर था। फोन पर बात होने से दिव्या को सरगम की परेशानी का अंदाजा हुआ और उसे भी नव्या की चिंता सताने लगी। दिव्या संयुक्त परिवार में रहती थी, परंतु ईश्वर की कृपा से अभी उसका परिवार कोरोना संक्रमण से पूर्ण रूप से बचा हुआ था।


उसने सरगम को तसल्ली दी कि घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है और कुछ नहीं होगा नव्या को, सब बहुत जल्द ठीक हो जाएगा ।परंतु सरगम बात करते-करते लगातार रोए ही जा रही थी। खैर ,उन्होंने बात खत्म की और फोन रख दिया। अगली सुबह जब सरगम के पति प्रखर अपने मां बाबूजी से मिलने हस्पताल जाने के लिए निकल ही रहे थे तभी घर की सीढ़ियों में उसे दिव्या और उसके पति मिले ।प्रखर कुछ समझ नहीं पाया, वह घबरा गया कि ऐसे हालातों में कोई किसी के घर बिना बताए कैसे आ सकता है। वह अवाक रह गया। इससे पहले कि वह कुछ समझ बोल पाता,दिव्या घर के अंदर घुसी और सरगम से पूछा कि नव्या के कपड़े और उसका सभी सामान कहां रखा है ।सरगम कुछ समझ नहीं पाई। संक्रमण की वजह से दिव्या अधिक देर तक सरगम के घर में रुकना नहीं चाहती थी ,इसलिए उसने अलमारी से बच्चे के सभी कपड़े ,दवाइयां और जरूरी सामान निकाला और सोती हुई नव्या को लेकर चलने लगी। सरगम सारी बात समझ गई। उसकी आंखों से लगातार अश्रु धारा बहे जा रही थी। परंतु, इस बार उसकी आंखों में दुख या तनाव के आंसू नहीं थे ,अपितु उस वक्त वह अपनी सच्ची दोस्ती के रिश्ते पर गर्व महसूस कर रही थी और भावुक होकर लगभग निशब्द हो चुकी थी।


पिंकी सिंघल

शालीमार बाग दिल्ली