जला के दीपक

मन मे ज्ञान का जला के दीपक

ज्योत्सना का भंडार भरूँ।

अनुपम ज्ञान की लौ जला कर

दूर सब अंधकार करूँ।

स्वप्न सुनहरे पूरे हो जीवन के

नव पल्लव मे ज्ञान का अनुराग भरूँ।

शिक्षा की महानता को पहचाने

ऐसा सब प्रयास करूँ।

कच्ची सी मिट्टी को जोड़ूँ, 

खोट निकालूँ कुंभकार का 

काम करूँ।

नन्हे नन्हे परिंदों का जब

कान मे गूंजें  मधुर करलव

तब पक्की नीवों का आगाज़ करूँ।

सुरमई से नभमण्डल पर 

चंद्रिका बिखरे

सात रंगों से नीला आसमान भरूँ।

माँ के आँचल सा पसरा 

गुरु का आशीर्वाद है

शिक्षक बनकर मैं शिष्यों मे

ज्ञान का प्रकाश भरूँ।

नन्हे नन्हे पंखों वाले पक्षी

जब अपने पंख फैलायेंगे, तब

क्षितिज़ तक उनकी उड़ान भर दूँ।

अज्ञानता का अंधकार मिटा कर

एक श्रेष्ठ शिक्षक का काम करूँ।

ऐसे ही बढते रहेंगे पल्लव

और परिपक्व बन जायेंगे

फिर फलों का अरमान का करूँ।

बड़े बड़े ये वृक्ष बन

नई कोपलों को सिखायेंगे

ऐसा ज्ञान सबल कर दूँ।

प्रीत निभाये शिष्य, गुरु से ऐसे,

घुले रागिनी अध्धयन मे

कठिन परिश्रम कर, प्रबल कर दूँ।


सरिता प्रजापति,दिल्ली