सहनशील प्रकृति

ये दो सालों में दुनियां की तस्वीर ही बदल गई हैं।उन्मुक्त घूमते फिरते और व्यवसाय करते लोग घरों में बंद हो के रह गएं हैं,और अब निकल भी रहे हैं तो एक भीति के तहत डरे और आशंकित।जो मिला इतने सालों में उससे अधिक खोया हैं,आर्थिक,सामाजिक और व्यवसायिक क्षेत्र में,क्या ये हमारी ही गलतियां हैं?

उसके उपरांत देश विदेश में सभी जगह कुदरती आपदाएं और कहर ढा रही हैं।छोटे मोटे भूचाल तो आते ही रहते हैं ,नुकसान तो नही होता, किंतु बड़े भूचलों से जन और माल का नुकसान होता हैं।

इतने बवंडर और तूफान आए अपने देश में भी और अमेरिका मे आएं और तबाही मचा दी।ये सब कुदरत के साथ मनुष्य द्वारा  की गई अतिश्योक्तियां ही हैं जिसे कुदरत मुद्दतों से बर्दाश्त कर रही हैं।अति का भी अंत तो होता ही हैं ये  सभी को विदित है लेकिन उसके दुष्परिणाम क्या होंगे यह अकल्पनीय हैं ।

    एक ओर मुसीबत नजरें गड़ाए तक के खड़ी हैं तटीय इलाकों पर,समुद्र ने निगल जाना हैं तटीय इलाकों की भूमि को ।जो ग्लोबल वार्मिंग का परिणाम होगा,ये प्रक्रिया चाहे धीमी गति से हो किंतु खूब  मक्कमता से आगे बढ़ रहीं हैं।वैज्ञानिकों के द्वारा दी गई इस चेतावनी को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए।उत्तर ध्रुव में कुछ ४० साल से अंदाज से कुछ ४३०५  के कद की एक हिमशिला पिगल रही हैं जो पूरी तरह पीगल जायेगी तो समुद्री सपाटी ३ मीटर जितनी उपर उठने से तटीय इलाके पानी की गर्त में चले जायेंगे।

खास कर खड़ी का इलाका,अगर ऐसा होगा तो भौगोलिक फेरफार करने की नौबत आ जायेगी।यह देखने में आया हैं कि १८७८ से १९९३ तक गुजरात और महाराष्ट्र का १६.९६ किलोमीटर जमीन की समुद्र में चली गई हैं,तब तो इतना ग्लोबल वार्मिंग नहीं था जितना अब हैं,तो आगे की सोच दिल डर से भर जाता हैं।

  अभ्यासिओं ने देश के समुद्र तट को अभ्यास हेतु चार हिस्सों में बांट दिया हैं, कोची,चेन्नई,विशाखा पट्टनम और मुंबई, मुंबई के अंतर्गत गुजरात का तटीय प्रदेश और तमिलनाडु में  आंध्र   प्रदेश की गिनती आ जाती हैं।सिर्फ चेन्नई में दरियाई पानी पीछे जाने से ४.७ किलोमीटर जमीन वापस मिली हैं।गुजरात के कच्छ की परिस्थिति विचारणीय हैं,भूकंप की वजह से काफी सामुद्रिक बदलाव आने की वजह से ६२ की. एम. भयजनक तरीके से बस्तियों में पानी आ गया हैं।वैसी ही परिस्थिति सौराष्ट्र के पोरबंदर की हैं। वहां समुद्री उंडाई कम होने की वजह से पानी जल्दी ही आगे आ सकता हैं।जामनगर और भरूच का दरियाई विस्तार १७० k.m. का हैं जहां समुंद्र का पानी आगे आने की शुरुआत हो चुकी हैं।वलसाड जिल्ले के कुछ गांव में कुछ २५ सालों में २ km जितना अंदर आ चुका हैं।कुछ गांव वालो को तो  स्थलांतर करना पड़ गया हैं।

अब ग्लोबल वार्मिंग को कैसे कम करना हैं यह अपने हाथ में हैं।इतने एयर कंडीशन चलते हैं,घरों में और गाड़ियों में,बिल्डिंगों में लकड़ी की जगह शिशें लग रहे हैं जो गर्मिको परिवर्तित करते हैं,और लकड़ी शोषण कर लेती हैं।लेकिन लकड़ी काटेंगे तो जंगल कम होने से भी ग्लोबल वार्मिंग बढ़ेगी,ये विष चक्र हैं जिसे कोई अभिमन्यु ही भेद सकेगा।


जयश्री बिरमी

अहमदाबाद