एक बार फिर खोना है

पढ़ों, बढ़ों, करो, सिखाने वाला हर सयाना बैठा है!

तुम निकलो! देखो द्वार पर लेने तुम्हें रथ खड़ा है!!

हज़ारों लोग को देखो, गम की आशियाना में बड़ा है!

जीत की उम्मीद की राह पर, उनके हर गम छोटा है!!


शहीदों की इच्छाशक्ति भरो, कई आसमान पर ही पड़ा है!

शक्ति-सामर्थ्य के आगे इच्छाशक्ति भरे कमज़ोर खड़ा है!!

दुनिया को समझो! लोग स्वयं को समझकर आगे चढ़ा है!

श्रेष्ठता की उपाधि लिये, दुनिया से ठोंकर खाकर गिरा है!!


काले-काले बादल मदमस्त खुले आसमान में उड़ चला हैं!

तुम ठहरो! देखो सूर्य की रौशनी एक पल के लिए रुका हैं!!

बुरे को पीछे धकेलना है और अच्छाई के संग चले जाना है!

कभी रुकना है, कभी हसीन ज़िन्दगी के वजूद में आना है!!


दुनिया है, दुनियादारी है और शीशा है, इससे भीड़ जाना है!

लोग दुनिया शीशे में देखता है, शीशे की परछाई में आना है!!

आखरी साँस तक चलना है, मुहब्बत के कुछ पल पाना है!

सतरंगी मैले के सांसारिक दुनिया से एकबार फिर खोना है!!


सौरभ कुमार, जामताड़ा(झारखण्ड)