सबके लिए

सूरज डूबता चांद चांदनी दे

चांद उगता सूरज धूप दे

नदी बहती है कल कल

प्यासा न रहे कोई पथिक

नदी किनारे लगे वृक्ष

देते हैं पथिकों को छाया

फल ही नहीं देते वे केवल

वस्त्र औषधि इनकी देन

ऊंचा सा नीला आसमान

देता जमीन को बरसात

यह जमीन जिसकी हर सांस

सिर्फ औरों औरों के लिए

मानवता के लिए जीना ही

सच्चे रूप में जीना है

खुद को जिए तो क्या

यूं तो कीड़े मकोड़े भी जीते हैं

एक चींटी भी देखिए परिश्रमी

कितनी सामाजिक है होती

पहले देखें खुद को फिर

देखे सभी और औरों को

जब देखेंगे सबके लिए

तो जिएंगे अपने लिए

देश भी बदल जाएगा

समस्याओं से निजात पायेगा

पूनम पाठक बदायूँ

इस्लामनगर उत्तर प्रदेश