क्या बेसहारा को सहारा उचित हैं

अफगानिस्तान में हो रहे जुल्मों से पूरी दुनियां ज्ञात हैं।उनके खिलाफ बोलने वाला कोई नहीं हैं।जुल्म ओ सितम का आलम छाया हुआ हैं। कहीं गोलियां चलती हैं,कही गटरों में डुबोके अपने अंदर की गंदगी दिखाई जा रही हैं।औरतों को घर बैठा दिया, ये कह कर कि उनका काम सिर्फ बच्चे पैदा करना हैं।कहा हैं वो देश जिन्हो ने बिना सत्य जाने गुजरात में हुई वारदातों को सुने ,जाने और समझने की कोशिश भी नहीं की लेकिन सवालों से और प्रतिबंधों से नवाजा था।यही समय हैं उनके लिए बोलने का,प्रतिरोध कर के ऐसे जुल्मों से इंसानियत  को बचाने का।

काबुल के हवाई अड्डों के दृश्य दिल को जंजोड कर रख देते हैं ,उन्हों ने तालिबानियों के हाथों से मर ने से ज्यादा  विमान से गिर कर मरना पसंद किया।

कितने लोग मर गए और कितने घायल किया गया कोई हिसाब नहीं।बच्चे,और औरतें को ही ज्यादा तकलीफें हैं। कितनों ने देश छोड़ा उसका भी कोई हिसाब नहीं हैं।अब देश छोड़ के जाने वालों का भविष्य क्या हैं ये प्रश्न तो हैं ही,लेकिन जहां आश्रय पाते हैं उस देश का क्या होगा,क्या ये आश्रित लोग फ्रांस में हुए किस्सो का पुनरावर्तन नहीं करेंगे? 

जिस देश में आश्रय मिलता है इसिको हड़पने की कोशिश करेंगे या उसी देश के शरीफ नागरिक  नाम कर देश की उन्नति और प्रगति के लिए काम करेंगे क्या? वफादारी का सिला देंगे या बेवफाई की मिसाल, ये कोई नहीं  जानता।आज सभी देश जो उन अफगानिस्तान के लोगों को आश्रय देने से डर रहें हैं, क्योंकि जो फ्रांस में हुआ और उसका जो प्रतिभाव पूरी दुनियां के इस्लामिक देशों ने दिया वह एक चेतावनी सा था।

अभी तो ये खूब दया के पात्र हैं,उनकी जान पर खतरें मंडरा रहें हैं,दर हुआ अफगान नागरिक अपने बच्चों को अमेरिकन सैनिकों को दे रहें हैं कि वह बच जायेंगे इन आधुनिक राक्षसों से। औरतें भी खूब प्रताड़ित हुई जा रहीं है,बहु बेटियों को भी वह लोग बाहर भेजना चाहते हैं उनकी जान और शील की रक्षा के लिए। अफगानी स्थान की २ करोड़ महिलाओं को  उनकी रक्षा के कारण हिजाब में रहना अनिवार्य हैं।अगर वे इससे चूक गए तो  सजाए बहुत ही कठोर हो सकती हैं।

उनको अपने देश में आश्रय देने  से ज्यादा उन्ही के देश में सम्मान पूर्वक जी सके ऐसे उपाय ढूंढ ने चाहिए।जैसे ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट खिलाड़ियों ने अफगान की टीम के साथ खेलने के लिए मना कर दिया क्योंकि उनकी महिलाएं क्रिकेट नहीं खेल सकती तो उनकी पुरुष टीम के साथ भी नहीं खेल, उनका बहिष्कार कर  उन महिलाओं के प्रति जो हिजाब के कारण नहीं खेल सकती निष्ठा दिखाई हैं।ऐसे ही दुनियां के देशों और अलग अलग संगठनों को कोई न कोई  नियम बना उनका बहिष्कार कर, उनको आश्रय देने के बजाय उन्हीं के देश में सुरक्षित रहें और दुनियां में शांति बनी रहे।

अगर यही आगाज रहा तो अंजाम के लिए ईश्वर को ही कुछ करना पड़ेगा,मानव असहाय हो गया लगता हैं।हमारे देश में  बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओ के विचार से एकदम विपरीत परिस्थियां वहां दिख रही हैं।

जयश्री बिरमी

निवृत शिक्षिका

अहमदाबाद