कोरोना महामारी में आभासी शिक्षा और संकट

किसी भी काल, समय व देश में शिक्षा मनुष्य जाति की सबसे बड़ी पूँजी है। यही कारण है कि प्राचीन काल से लेकर आज तक सम्पूर्ण सृष्टि के मनुष्य जाति शिक्षा के द्वारा ही अपना मौलिक अधिकार से परिचित हो पाया। संविधान निर्माता बाबा साहब अम्बेकर के शब्दों में- “शिक्षा वो शेरनी का दूध है जो जितना पियेगा वो उतना दहाड़ेगा”। यहाँ मुझे संस्कृत का श्लोक याद आ रहा है- 

विद्या बंधुजनो विदेशगमने विद्या परा देवता,

विद्या राजसु पूज्यते न हि धनम् विद्या-विहीन: पशु:। 

शिक्षा मनुष्य जाति की पहचान है। भारत के प्राचीन आचार्यों ने मनुष्य के लिए शिक्षा को देवता से भी ऊपर स्वीकार किया है। भारत जब विश्व गुरु था तब यहाँ की शिक्षा व्यवस्था भी सुदृढ़ थी। देश में नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय और तक्षशिला विश्वविद्यालय जैसे समृद्ध शिक्षण संस्थान भी था, जहाँ देश – विदेश से छात्र आकर विद्यार्जन करता था। किंतु आज स्थिति ऐसी है कि भारत का कोई भी शिक्षण संस्थान विश्व के शिक्षण संस्थानों में रैंकिंग एक पर नहीं है। इसके बावजूद हम भारत को विश्व गुरु के रूप में कल्पित स्वप्न देखते हैं- पहली बात। दूसरी बात- पिछले दो वर्षों से भारत और विश्व के अन्य सभी देश कोरोना महामारी के संकट से उभर नहीं पा रहा है। कोरोना महामारी ने सम्पूर्ण व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है। देश की आर्थिक स्थिति चौपट सा हो गया है। देश में बेरोजगारी बढ़ने लगी युवा सड़क पर आ गया। देश की कई बड़ी-बड़ी कंपनियाँ अनिश्चितकालीन तक स्टाफ़ की छुट्टी कर दी। तीसरी बात यह है कि विश्व सहित भारत में कोरोना महामारी के इस दौर में बदलते शिक्षा का स्वरूप और डिजिटलीकरण ने विशेष रूप से भारत के गरीब विद्यार्थियों का बहुत बड़ा नुकसान किया है। जिसमें सबसे बड़ा नुकसान किसी भी गरीब समुदाय के बच्चों का हुआ है। वैश्विक स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटलीकरण तो सही है, किंतु भारत के संदर्भ में सुदूर ग्रामीण इलाकों में रहने वाले गरीब माँ बाप के बच्चों के लिए शिक्षा एक नयी चुनौती बन गयी है। इसे भारत देश के गरीब बच्चों का दुर्भाग्य ही कहा जाय तो उचित होगा। चूँकि सरकार बेचारी है ऐसे समय में डिजिटलीकरण को लेकर सरकार को घेरना बचकाना साबित होगा और भक्तगण भी टूट पड़ेंगे, तो इन चीजों से बचना अत्यंत जरूरी है। ऐसे भी डिजिटलीकारण के विभिन्न ‘गूगल मीट’, ‘ज़ूम’ आदि मीटिंग एप्स ने लॉक डाउन के ऐन मौका पर एक दूसरे से जोड़ कर रखा है। कम-से-कम सप्ताह में एक दो मीटिंग हो ही जाती थी। भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों ने आभासी दुनिया के द्वारा  ढ़ेर सारे सेमिनार, काव्य संगोष्ठियाँ करायी। ऐसा कोई भी दिन नहीं था जिस दिन विश्वविद्यालय के कुलपति का संभाषण सुनने के लिए नहीं मिलता था। कुल मिलाकर लॉकडाउन के समय आभासी दुनिया ने मानव जाति को बहुत साथ दिया। अब समझ में यह नहीं आता है कि कोरोना महामारी के कारण भारत के शिक्षा व्यवस्था में डिजिटलीकरण कहाँ तक उचित है? चूँकि शिक्षा व्यवस्था में डिजिटलीकरण के प्रयोग से भारत में गरीब विद्यार्थी एंड्रॉयड फोन कहाँ से लाएगा? यदि स्मार्ट फोन का व्यवस्था किसी तरह से कर भी लिया जाय तो उसके लिए नेट और नेटवर्क की समस्या से कैसे निपटेगा? क्या सरकार इसके लिए कोई उपाय कर रही है जिससे गरीब और ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले आम जनता की समस्या का समाधान हो सके? चूँकि सरकारी व्यवस्था के बिना ग्रामीण क्षेत्र और गरीब बच्चे शिक्षा में पीछे छुट जायेगें। इसका सबसे बड़ा कारण है देश की आधी आबादी अभी भी झोपड़ी में गुजर बसर कर रही है। जो माँ बाप दिन भर मजदूरी करने के बाद शाम को काम से लौटने के दौरान खाने का खाद्य सामग्री खरीद पाता है उसके लिए तो मोबाइल फोन खरीदना बिलकुल मुश्किल हो रहा है। इस संबंध में कुछ ज्यादा बात करना भी दंडनीय अपराध हो सकता है किंतु हमें तो लगता है कोरोना वायरस के कारण उपजी समस्या से निपटने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में आभासी दुनिया का प्रयोग घोर संकट उत्पन्न कर सकता है। परिणामतः गरीब बच्चों के लिए शिक्षा मुश्किल हो जायेगी। और इस तरह एक बार फिर से शिक्षा एक एकमात्र पूँजीपति परिवार के बच्चों के लिए होकर रह जायेगी।

-- मनीष कुमार

महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिहार