अमेरिकाः कांटे से कांटा निकालने की तैयारी

अमेरिकी फौजों की अफगानिस्तान से वापसी, दोहा समझौते के बावजूद साजों सामान छोड़कर वापसी करना, बिना किसी संघर्ष के पूरे अफगानिस्तान पर तालिबान का काबिज हो जाना, ऐसी घटनाएं हैं जो अमेरिका व तालिबान के बीच के  रिश्तों की कई अनकही कहानी कहती हैं। हालांकि कुछ लोगों को यह 46 साल पहले की वियतनाम से अमेरिका की वापसी की याद दिला सकता है। उस समय वियतनाम की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी वैश्विक सुरक्षा और अमेरिकी हितों  के लिए इतना बड़ा खतरा मानी जाती थी कि अमेरिका बरसों तक उससे लड़ता रहा। इसमें  58 हजार अमेरिकी सैनिक मारे गए। अमेरिका को बुरी तरह बेइज्जत हो कर वियतनाम से हटना पड़ा था। लेकिन आज वही अमेरिका, वियतनाम का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है। 

अमेरिका, वियतनाम को चीन के खिलाफ महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सहयोगी मानता है। उसी वियतनाम की यात्रा इसी हफ्ते अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने की है। लेकिन अमेरिका का आज का दोस्त वियतनाम बदला नहीं है। वहां अब भी दमनकारी शासन है। अमेरिका तो वियतनाम में कम्युनिस्ट शासन खत्म करने के लिए लड़ रहा था जबकि अफगानिस्तान में लड़ाई तालिबान और उसके आतंकी सहयोगियों के खात्मे के लिए 20 साल तक लड़ी गई। लेकिन अब जो स्थितियां बन रही हैं, उसमें तालिबानी अफगानिस्तान भी वियतनाम की तरह अमेरिका और अन्य लोकतांत्रिक शक्तियों का मित्र बन सकता है। इस दोस्ती की शुरुआत में वियतनाम की तरह 50 साल नहीं लगेंगे बल्कि यह आईएसआईएस के खिलाफ तत्काल संयुक्त अभियान से शुरू हो सकती है। 

इस हफ्ते की घटनाओं से पता चलता है कि अमेरिका और तालिबान के रिश्ते बदल रहे हैं। काबुल एयरपोर्ट पर बम धमाकों की घटना के बाद प्रेसिडेंट जो बिडेन ने बदला लेने और कार्रवाई करने की बात कही। लेकिन एक बार भी तालिबान को दोषी नहीं ठहराया। बिडेन ने साफ कहा कि हमलों के लिए जिम्मेदार आईएसआईएस खोरासान, तालिबान का कट्टर दुश्मन है। अमेरिकी सेना के कमांडर, जनरल केनेथ मेकेन्जी ने कहा है कि अमेरिकी सेनाओं की वापसी के लिए तालिबान के साथ मिल कर काम किया जा रहा है। वर्तमान हालात में अमेरिका के पास तालिबान से मिलकर काम करने के अलावा कोई चारा भी नहीं है। लेकिन 31 अगस्त या जब भी अफगानिस्तान से निकासी का काम पूरा होता है। उसके बाद भी आईएसआईएस-के तो वहां मौजूद ही रहेगा। 

तालिबान उसकी मौजूदगी का फायदा उठाकर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों से अपने हित के काम करा सकता है। एक दिन में आईएसआईएस ने जितने अमरीकियों को मार दिया उतने तो तालिबान 2019 से अब तक नहीं मार पाया था। डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन के साथ 2020 मे दोहा में हुए करार के बाद तालिबान ने अमेरिकी सेनाओं पर हमले वस्तुतः बन्द ही कर दिए थे। उधर आईएसआईएस-के अफगानिस्तान पर कब्जा करने की रणनीति पर चल रहा है । ऐसे में तालिबान की प्राथमिकता में उसका जड़मूल से खात्मा करना है। काबुल पर कंट्रोल करने के बाद तालिबान ने इसका संकेत जेल में बन्द आईएसआईएस - खोरासान के एक पूर्व नेता को मौत के घाट उतार कर दे दिया है।

आईएसआईएस के खिलाफ अमेरिका के संघर्ष में अजीबोगरीब तरह के समीकरण बनते रहे हैं। मिसाल के तौर पर इराक और सीरिया में इस गुट के खिलाफ अमेरिका ने कुछ ऐसे सीरियाई विद्रोही गुटों को साथ में लिया जिनके पहले अल कायदा से ताल्लुक थे। इसके अलावा एक कुर्दिश मिलीशिया से भी गठजोड़ किया गया जबकि वह अमेरिका की आतंकी सूची में शुमार था। इस गुट को ईरान समर्थित शिया मिलीशिया का समर्थन था। 

अफगानिस्तान में भी बीते दिनों ऐसा कुछ देखने को मिला जिसकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। यह घटना थी सीआईए के निदेशक विलियम बर्न्स द्वारा काबुल आ कर तालिबान के टॉप लीडर से मुलाकात की। आईएसआईएस-के को ग्लोबल सुरक्षा के प्रति बहुत बड़े खतरे के रूप में पेश करने में तालिबान का निजी स्वार्थ है। ऐसे में अगर अमेरिका भी आईएसआईएस-खुरासान को अंतरराष्ट्रीय खतरा मान लेता है तो बहुत मुमकिन है कि अमेरिका और तालिबान के बीच खुफिया जानकारी के आदान प्रदान का रिश्ता हो जाये। 

लेकिन तालिबान की संरचना जिस तरह की है, उसमें कट्टरपंथी गुटों और पर्दे के पीछे वाले ईरान जैसे समर्थकों के चलते अमेरिका खुद एक नए भंवर में फंस सकता है। आईएसआईएस-को भी विभिन्न स्रोतों से मदद मिल ही रही है, उसके ताल्लुक अल कायदा, आईएसआईएस और तालिबान के भीतर मौजूद हक्कानी नेटवर्क से भी हैं। चीन, रूस और पाकिस्तान अपने लिए नए मौके तलाश रहे हैं। ऐसे में अमेरिका अगर तालिबान के साथ मिलकर आईएसआईएस-के के खिलाफ कोई मोर्चा खोलता है तो उसके लिए नई मुसीबत खड़ी हो सकती है। 

यह एक तरह का नया ट्रैप साबित हो सकता है जिससे पीछा छुड़ाना आसान नहीं होगा।क्योंकि आईएसआईएस की मौजूदगी प्रमुख रूप से सीरिया और इराक में है। जब कि तालिबान की केवल अफगानिस्तान में। आईएसआईएस के संगठन का विस्तार दुनिया के अन्य देशों मसलन लीबिया, इजिप्ट, सऊदी अरब, यमन, अल्जीरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नाइजीरिया, दक्षिण कॉकेशियन, गाजा, सोमालिया, फिलीपींस, कांगो, मोजाम्बिक, बांग्लादेश, अजरबैजान, तुर्की में भी है। आईएसआईएस पूरी दुनिया में खलीफा शासन स्थापित करना चाहता है। इसके लिए वह हिंसा और आतंकवाद का इस्तेमाल करता है।

तालिबान की वारदातों का दायरा अफगानिस्तान में ही रहा है। तालिबान ने आमतौर पर अफगानिस्तान में मौजूद अमेरिकी सेनाओं को ही निशाना बना कर हमले किये हैं। आईएस और तालिबान दोनों ही शरीयत लागू करना चाहते हैं। आईएस के कतर, तुर्की, सऊदी अरब, लेबनान मुख्य मददगार हैं। इनके अलावा दुनियाभर में फैले तमाम अन्य आतंकी संगठन आईएस की मदद करते हैं।

आज तालिबानियों के पास 6 लाख असाल्ट राइफलें, 2 हजार बख्तरबंद गाड़ियां, 40 विमान, 1,62,000 संचार उपकरण, 16 हजार नाइट विजन गॉगल्स, 4702 हमवी गाड़ियां, 20,040 हथगोले, 2520 बम, 1394 ग्रेनेड लांचर, लाखों गोलियां अमेरिका से हाथ लग गये हैं। ऐसे में ताकत तो तालिबानियों की बढ़ी है। पर क्या यह ताकत उसे आईएस के खिलाफ इस्तेमाल करने के कांटे से कांटा निकालने की नीति में काम आयेगी, यह एक बड़ा सवाल है।