अनुभूति


इच्छा प्रबल, मैं मेघ सी

अंबर पर जा छा जाऊँ,

इच्छा प्रबल जग को भूल

ईश्वर की मैं हो जाऊँ।


इच्छा प्रबल मैं जग के

जंजाल से विलग हो जाऊँ,

इच्छा प्रबल भक्ति का फूल

पूर्व मृत्यु के पा जाऊँ।


इस धरती पर कभी कहीं

ना काव्या सा फूल खिले,

इस धरती पर कभी कहीं

न सत्य जाकर धूल मिले।


इस धरती पर जीवन को

अमराई की छाँव मिले,

इस धरती पर दीनों के

हक में चलता पाँव मिले।


आज जगत में जो साथी

सभी का अपना गाँव है,

आज जग में कुरेद रहा

मानव,मानव का घाँव है।


आज जगत में असत्य के

चढ़ी भेंट सत्य की नाव है,

आज जगत में रिश्तों के

क्यों अनगिनत से दाँव हैं।


यह सोने का हॉट सजा

पर मणियों का द्वार कहाँ?

यह बगिया में फूल खिले

पर कोमल कमल दल कहाँ?


यहाँ अपनों का संसार

पर हिय भावन लोग कहाँ?

यह सुख का सुंदर सपना

पर इसमें है सत्य कहाँ?


देखा यह नीला अंबर

देखी यह धरती प्यारी,

देखा मैंने जीवन में

पर लोक की तैयारी।


देखा सपनों के आगे

जीवन की छोटी क्यारी,

देखा मैंने शक्ति पथ पर

किसकी है महिमा न्यारी।



उठ अब चल देर हो रही

मृत्यु द्वार पर आई है,

उठ अब चल इस जीवन से

मिलती तुझे बधाई है।


उठ अब चल नीरवता में

चंदन की अगुवाई है,

उठ अब चल पार लोक के

मिलन ही अब विदाई है।।


अंजनी द्विवेदी (काव्या)

देवरिया ,उत्तर प्रदेश