दीप नहीं जो

वो ही दीप नहीं है जो

जलकर बुझ जाते हैं

वो ही दीप नहीं जो अपने

तले अंधेरा रखते हैं

सूरज भी सोने जाता है

चांद भी छुप जाता है

तारे छपते हैं रोज

और ये आते फिर रोज

कुछ ऐसे भी दीप हैं

जो बुझने के बाद भी

अमर हो जाते हैं और

चमकते हमेशा रहते हैं

वो होते हैं महापुरुष

जो मर कर भी जीते हैं

और देते हैं संदेश

मानवता हो पूजनीय

वो ही दीप नहीं जो

संध्या को जलते हैं

ये वो दीप हैँ जो

रोशनी में करते उजाले हैं

पूनम पाठक बदायूँ