कर्ण

एक ऐसा पात्र महाभारत का जो बहादुर और नैतिकता होने के बावजूद अपने अंतरात्मा को मार कर भी अपनी वफादारी अन्याय की तरफ दिखता हुआ एक सज्जन हैं। उच्च कुल में पैदा हुआ ,उच्च कुल के लक्षण बचपन से ही दिखने लगे थे किंतु सारथी पुत्र का बिरूद ले अपनी कुलीनता को भरमाता रहा।

माता पिता को अपनी आकांक्षा बता सारथी नहीं बनने के दृढ़ निश्चय के साथ अपनी धनुर्धर  बनने की इच्छा बहुत छोटी उम्र में ही जता  दिया था।माता पिता का लाडला था तो अति महत्वाकांक्षी भी था ।गुरु द्रोण सिर्फ क्षत्रियों को ही शिष्य बनाते थे, और भगवान परशुराम सिर्फ ब्राह्मणों को विद्या प्रदान करते थे।  धनुर्विद्या सीखने के लिए करबद्ध कर्ण ने  जूठ बोल परशुराम से विद्या ग्रहण की और अर्जुन का समकक्ष बाण विद्या सीखी।उसके अभ्यास समाप्ति की ओर था तब,

जब एक बार वन में गुरु परशुराम उसकी गोद ने सिर रख सो रहे थे तो भूमि से निकल कर एक भौंरे ने उसकी जंघा के निचले हिस्से को कुतर दिया और खून बहने लगा और बहकर खून परशुराम के नीचे तक पहुंचा।खून की गर्मी के एहसास से परशुराम जाग गए और जब मामला समझे तब वे समज गए कि जो सहनशक्ति उन्होंने कर्ण में देखी वह एक क्षत्रिय में ही हो सकती हैं।और कर्ण को उनसे छल करने की बात जान क्रोधित हो उठे।उनका क्रोध दुर्वासा से कम नहीं था।उन्होंने उसे अभिशाप दिया कि उसके धोखे से प्राप्त की उनकी शिक्षा उसकी जरूरत के समय ही साथ न देगी।बहुत ही आहत हुए कर्ण ने उनको बताया कि उसे अपने कुल का भी कुछ पता नहीं था तो भगवान परशुराम का मन पसीज गया और कर्ण को अपना विजय धनुष्य दे विदा किया।

 कर्ण को एक ओर अभिशाप एक ब्राह्मण ने दिया था।एकबार कर्ण कोई राक्षस के पीछे उसका वध करने भागा जा रहा था,उसने उस राक्षस को तीर भी मारा लेकिन राक्षस  अदृश्य हो गया और उसके तीर से एक ब्राह्मण की गाय मार गई और असहायता में मारी गाय की चिन्हित कर क्रोध में शाप दिया कि कर्ण की मृत्यु भी ऐसी ही असहाय स्थिति में ही होगी।इन्ही दो अभिशापों की वजह से उसकी मृत्यु बहुत ही असहाय परिस्थिति में हुई,वह न तो रथ पर था न ही हाथ में हथियार था ,असहाय सा था जब अर्जुन  तीरों से उसकी मौत हो गई ,समझो बेमौत ही मारा गया जैसे  युध्धों में होता हैं।

कर्ण के पात्र को देखें तो उच्च कुल में जन्मा, जन्म से त्यागा हुआ अनाथ को एक आर्थिक निम्न स्तर के परिवार,  सारथी के घर में पला,नैतिक और कुशल किंतु मित्र के गलत आचरण और  विचारों वाला होने की वजह से अपने विचारों के विपरीत व्यवहार करना पड़ा।

 दुर्योधन के एक एहसान  जो उसे,अंग देश का राजा बनाने का था जिससे उसे अपने चारित्र हनन का अपराध करना पड़ा।कहावत हैं न कि –खाता है मुंह और शर्म आंखो को करनी पड़ती हैं।उसको राज देनेें वाले दुर्योधन के लिए उसने सभी बुरे कार्यों,जुआ खेलना,द्रौपदी  चीर हरण ,सारे प्रपंच और षड्यंत्रों में सकार्य हिस्सा लिया वो भी उसके अपने व्यक्तित्व से विरुद्ध जा के।उसके स्वभाव में दया भाव था तभी तो दूसरों के कष्टों को देख उनकी मदद कर ने के लिए तैयार रहता था।उसे दानवीर कहा जाए उतना दानेश्वर था।जिसने जो मांगा उसने उसको वह दिया और यहां तक कि उसके कवच और कुंडल जो उसकी आत्म रक्षा के लिए थे वह भी ब्राह्मण स्वरूप में आए इंद्र को दे दिए थे।सूर्य पुत्र होने की वजह से कांतिवान  और प्रतिभाशाली था, आज ऐसे कर्ण को उसके मित्र दुर्योधन की वजह से एक नकारात्मक पात्रता मिली हैं।मित्र मंडली से ही मनुष्य की पहचान होती हैं,अगर कर्ण का मित्र दुर्योधन नहीं होता तो शायद वह सारथी ही बनता किंतु उसका चरित्र हनन होने से बच जाता।


जयश्री बिरमी

निवृत्त शिक्षिका

अहमदाबाद