जलियांवाला झांकी है, पार्लियामेंट अभी बाकी है

इतिहास बनाने में नाकाम रहने वाले इसमें छेड़छाड़ का प्रयास करते हैं। ये उद्गार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हैं, जो उन्होंने मार्च 2019 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (1857-1947) के शहीदों के शब्दकोश का विमोचन करते हुए व्यक्त किए थे। इस दौरान उन्होंने इतिहास को लेकर कई और अच्छी बातें कहीं थीं, जैसे- जो राष्ट्र उन लोगों को याद नहीं करता और सम्मान नहीं देता जिन्होंने उनके इतिहास का निर्माण किया है या उसका महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं,  अक्सर उस राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित नहीं होता।  मोदीजी ने तब ये भी कहा था कि अगर इतिहास को उसके वास्तविक रूप में स्वीकार किया जाता है तो ही यह आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करेगा। 

इतिहास को विचारधारा के पैमाने पर तोलने के प्रयास होते हैं और इन प्रयासों के कारण कई बार इतिहास से छेड़छाड़ होती है। मुझे लगता है कि इतिहास को इतिहास के रूप में लिया जाना चाहिए। यह आपकी या मेरी विचारधारा से बाध्य नहीं होना चाहिए और हमें इसमें बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। अब ये तो पता नहीं कि मोदीजी ने अपना ये भाषण खुद तैयार किया था या किसी ने उनके लिए लिखा था। अगर किसी और ने उनके लिए भाषण लिखा था, तब तो कोई बात नहीं।

 लेकिन अगर मोदीजी के ये अपने विचार हैं, तो फिर यह सवाल उठता है कि दो सालों में कोरोना महामारी के अलावा ऐसा और कौन सा बड़ा परिवर्तन हो गया, जिसका असर उनकी अपनी सोच पर पड़ गया है। वैसे यह कोई पहली बार नहीं है, जब मोदीजी अपनी बात से पलटे हों। दो करोड़ नौकरियां, महंगाई पर वार, काले धन की वापसी, भ्रष्टाचार का खात्मा, भारत को विश्वगुरु बनाना, ऐसे अनगिनत वादे हैं, जो उन्होंने किए, लेकिन पूरे नहीं हुए। अब यही कहानी इतिहास के साथ भी दोहराई जा रही है। 

मोदीजी ने 2019 में सच ही कहा कि इतिहास बनाने में नाकाम रहने वाले इसमें छेड़छाड़ का प्रयास करते हैं। विकृत मानसिकता से मुक्त होकर इतिहास पढ़ने वाले ये जानते हैं कि संघ का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में रत्ती भर भी योगदान नहीं रहा। जब नरम और गरम दोनों तरह की विचारधारा के लोग सब कुछ दांव पर लगाकर जेल जाने या फांसी पर लटकने को तैयार हो रहे थे, तब सावरकर जैसे लोग माफीनामा लिखने में झिझक नहीं रहे थे। 

आज वो वीर उपाधि से सुशोभित हो चुके हैं। ऐसी वीरता की तब रोपी गई पौध अब हिंदुत्व के खाद-पानी से सिंचित होकर बड़ा पेड़ बन गया है। इस पेड़ के बाशिंदे कभी 56 इंच की छाती का घमंड दिखाते हैं, कभी घर में घुसकर मारने की बात करते हैं। विधर्मियों को मार-काट का डर दिखाते हैं। ऐसा नहीं है कि अकेले संघ ने धर्मांधता के जहरीले फल से भरे पेड़ को उगा लिया है, सत्ता के लालच में आकर कभी कांग्रेस के भीतर बैठे दक्षिणपंथियों ने इसमें मदद की, कभी नेहरू विरोध के नाम पर लोहियावादियों ने अपना योगदान दिया।

 अब ये पेड़ लहलहा रहा है, इसकी शाखाएं देश के बाहर भी फल-फूल रही हैं, और इसे सदाबहार बनाए रखने के लिए जरूरी है कि उस इतिहास को मिटा दिया जाए, जिसके पन्नों पर गांधी-नेहरू का नाम लिखा था। इस काम की शुरुआत आजादी का अमृत महोत्सव मनाने वालों ने कर दी है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ने आजादी का अमृत महोत्सव के तहत एक कार्यक्रम के लिए पोस्टर जारी किए, जिसमें नेहरूजी की तस्वीर नहीं थी। कई कांग्रेस नेताओं ने इस पर आपत्ति व्यक्त की, जिस पर सफाई दी गई कि असावधानी से ऐसा हो गया, आने वाले दूसरे पोस्टर में नेहरूजी होंगे।

 वैसे परिषद को यह मालूम होना चाहिए कि देश के पहले प्रधानमंत्री और आधुनिक भारत को बनाने वाले पं.नेहरू किसी पोस्टर के मोहताज नहीं हैं।  मोदीजी ने इस मामले पर अब तक कोई टिप्पणी नहीं की है। हालांकि उन्हें दो साल पहले की अपनी बात को याद कर लेना चाहिए कि जिन्होंने इतिहास बनाया, अगर राष्ट्र उन्हें याद नहीं करता तो उस राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित नहीं रहता। इतिहास को उसके वास्तविक रूप में ही स्वीकार करने की बात मोदीजी ने कही थी, लेकिन वे इतिहास पर चकाचौंध का आवरण डाल रहे हैं। 

गुजरात में बापू के साबरमती आश्रम का 1200 करोड़ रुपये की लागत से नवीनीकरण करने का प्रस्ताव है, जिसके विरोध में कई गांधीवादी विचारकों ने खत लिखकर अपनी चिंता जतलाई है कि इससे गांधीवादी मूल्यों की पवित्रता, आश्रम की सादगी खत्म हो जाएगी। वैसे गांधीजी होते तो खुद इस खर्चीले काम के विरोध में शायद अनशन पर बैठ जाते। लेकिन मोदी सरकार के लिए ये देश और इसकी ऐतिहासिक विरासत सब एक उत्पाद की तरह है, जिसे चमकीले आवरण में लपेट कर बिकने के योग्य बनाना ही अंतिम लक्ष्य है।

बाजार में बिक्री के लिए सजे इस देश में अब उस शहादत स्थल को भी नहीं बख्शा गया है, जहां की मिट्टी खून से लाल हो गई थी, कुएं लाशों से पट गई थीं और दीवारों के साथ मानवता को भी गोलियों से छलनी कर दिया गया था। पंजाब के जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 को जनरल डायर ने जिस तरह शांतिपूर्ण ढंग से सभा कर रहे लोगों पर गोलियां बरसाई थीं और उस बाग से निकलने का एकमात्र रास्ता भी बंद कर दिया था, वह घटना इतिहास की क्रूरतम घटनाओं में से एक है। सौ बरस तक यह जगह साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, सत्ता की सनक पूरी करने के क्रूर तरीकों का गवाह बन कर आने वाली पीढ़ियों को सबक देती रही। 

संकरी गली से गुजर कर जब लोग जलियांवाला बाग तक पहुंचते तो गोलियों की बौछार और मासूमों की चीख-पुकार के बिना भी उस दिन को याद कर सिहर उठते, क्योंकि उस जगह पर सारी चीजें ज्यों की त्यों थी। लेकिन अब यह स्मारक किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की ऐशगाह की तरह बना दिया गया है। संकरी गली की दीवारों पर चमकीला पेंट और हंसते-मुस्कुराते चेहरे बनाए गए हैं। यहां के तालाब को एक श्लिली तालाब्य के रूप में फिर से विकसित किया गया है। उस दर्दनाक घटना की याद के लिए साउंड एंड लाइट शो की व्यवस्था की गई है।

 इसके अलावा पर्यटकों के लिए और भी कई सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। शहादत के तमाशे की ऐसी मिसाल दुनिया में शायद ही कहीं मिले। जर्मनी, रूस, जापान जैसे देशों के इतिहास भी अनेक विभीषिकाओं से भरे हुए हैं, लेकिन वहां उन स्थलों को इस तरह संभाल कर रखा जाता है, जिससे भावी पीढ़ियां इतिहास की गलतियों से सबक लेकर अपने भविष्य को बेहतर बनाएं। लेकिन भारत में त्रासदी में मौजमस्ती के मौके तलाशे जा रहे हैं। जनरल डायर के खूनी खेल को लाइट एंड साउंड से सजाकर पेश करने का यह काम भयावह है, जिस पर जनता को आवाज उठाना चाहिए। 

लेकिन खोखले देशभक्तों से भरे इस देश में अपने इतिहास और भविष्य को लेकर एक अजीब किस्म की बेपरवाही है। इसी का फायदा वर्तमान के शासक उठा रहे हैं। हम वाकई किसी मुर्दा कौम की तरह जी रहे हैं, जहां निर्वाचित सरकार के गलत काम का विरोध करने का बीड़ा केवल विपक्षी दल पर छोड़ दिया गया है, शेष जनता अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति में मगन है। उसे फर्क नहीं पड़ता कि गांधीजी के विचारों को गोडसे की गोलियों से कैसे खत्म किया जा रहा है। कैसे देश की जमा-पूंजी कुछ लोगों के खाते में भरी जा रही है। 

किस तरह इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। कैसे हमारी धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ हो रहा है।सोशल मीडिया पर पिछले दिनों एक वाक्य पढ़ने मिला था- जलियांवाला तो झांकी है, पार्लियामेंट अभी बाकी है। इस बाकी के खेल को समझना होगा। क्योंकि इतिहास बदलने का यह सिलसिला जब संसद होते हुए संविधान तक पहुंच जाएगा, तब इस देश को बचाना मुश्किल होगा।