कौओं की बैठक

बजी डुगडुगी जंगल मे आपात काल सा भान हुआ। स्वयं जाति उपहास पर चर्चा, होने का ऐलान हुआ।।

दूर दूर से मुखिया काग, वायु मार्ग से पहुंच गए। 

कुछ तो विविध बहाना करके,बी‌बी बच्चों संग दुबक गए।।बुढ़े काग लखैरू काका ने बैठक की अगुवाई की। जिनकी बेटी अदरकास्ट के नाबालिग संग‌ पराई थी।। 

कौओं ने एक बैठकर करके, 

मसले पर खूब विचार किया। चारो तरफ से सबने मिलकर कटु शब्दों का बौछार  किया।। देर से लौटे सब मूल विन्दु पर,लखैरू काका हटाए गए। उल्लू के ढकना चोरकट काका बैठक अध्यक्ष बनाए गए।।

विचार रखा यह  मिलकर सबने श्राद्ध पक्ष में  भोजन त्याग करने का। लिया  है निर्णय हमने अपने पूर्वज श्राद्ध करने का।।उस घर का अन्न वहिष्कार करेंगे।तब तक ना स्वीकार करेंगे। अपने घर में माता पिता का, जबतक लोग तिरस्कार करेंगे।। पितृपक्ष में ऐसे घरों के आदर से हम दूर रहेंगे।नास्तिक ना समझ बनकर जो अपने मद में   चूर रहेंगे।। ना जाने  किस अधम कर्म से,काग योनि में आए हम।अन्न वास्ते श्राद्ध पक्ष में, क्षुधा पूर्ति को धाए हम।। पितृपक्ष में श्राद्ध भोज्य से,  भविष्य हमारा संकट में।होता नहीं गुजारा फिरते,मारा मारा संकट में।।हम मानव बनने की चाहत का मिलकर परित्याग करेंगे।स्व जाति धर्म पर मिट कर भी, अपने पुरखों को याद रखेंगे।।सबने मिलकर किया समर्थन, एक नंबर का मुद्दा था। मिथ्यावादी मानव मन  में धोखा बिल्कुल पुख्ता था।।मानव से दूरी रखने पर,एक युवा काग ने प्रश्न किया।पर, सार्थक उत्तर पाकर उसने जंगल में मंगल जश्न किया।। सदाचार सद्कर्म छोड़,नीच कर्म पर उतरा मानव। इक्का-दुक्का छोड़ अभी लगता नहीं है सुधरा मानव।।

ऊपर वाला जिसे देख, रोज तरस खाता है। जीवों में अव्वल मानव अब,मन को नहीं भाता है। मांसाहारी जीवों का भोजन, हाथों से स्वयं झपटता है। स्वयं स्वार्थ की सिद्धि में, गिरगिट सा रंग बदलता है।। 


गौरीशंकर पाण्डेय सरस