भाग्य

ओह्ह !ये किस उलझन से

स्पंदन उच्छवासित है,

जलता पतंगा दीपक संग,

भाग्य उसके क्या यही अंकित है?


चातक मेघ की पहली बूँद को

अपलक निहारता रहता है,

अथाह अम्बुधि से भी वह,

प्यासा ही रह जाता है।


क्या सब भाग्य का लिखा है?

 या भाग्य में वेदना इन्होंने स्वयं गढ़ा है??


आज रजत मंजु मुकुर भी

क्यों लग रहा छलावा?

करतल की रेखा नहीं बनती,

भाग्य का अविचल सहारा।


पाँव स्वयं ही बढ़ाना पड़ता,

निज पदचिह्न बनाने को।

भाग्य को खुद सजाना पड़ता,

उर तिमिर मिटाने को।


नकारात्मकता की ओर क्यों हम झाँके?

कर्म जगाती उषा को क्यों न ताकें?

भाग्य भरोसे बैठकर मनुज पछताता है,

समय सारथी उसका,जो कदम से कदम मिलाता है।


               रीमा सिन्हा (लखनऊ)