शिक्षक की अभिलाषा

शहीदों ने दिखाया माँ भारती से नेह अपना ।

कृतज्ञता में किया माँ को समर्पित देह अपना।।


पराक्रम से अधिक उनका राष्ट्र से प्रेम प्रबल था।

जननी की आशीषों के आगे दुश्मन निबल था।।


उपकृत हृदय से शिक्षिका भी है उपस्थित ।

उसके करण में अर्पण का है भाव अवस्थित ।।


चाहती हूँ मै भी अपने भारत को सजाना ।

है मेरे भी पास अनमोल शिक्षा का ख़जाना ।।


नन्हे नरम पौधों को है फलप्रद वृक्ष बनाना।

नवीन पृष्ठों को है सार्थक शब्दों से सजाना ।।


सच्चे नागरिक के कर्तव्यों का बोध कराना है।

अधिकारों के लिए संघर्षों से जूझना सिखाना है ।। 


है रौशनी से अज्ञानता के तम को हरना ।

हर डगमगाती बाती के तन में तेल भरना ।


राष्ट्र गौरव हेतु वीरों का निर्भय दल बनाना है । 

मन में धीर धारण धर संकट में मुस्कुराना है ।।


नन्हे हृदय में  देशप्रेम की अलख जगाना है ।

अपने वतन को समर्पित सपूतों से सजाना है।


स्वरचित 

ऋतु श्रीवास्तव

पता - के ० बी ० 16 , कवि नगर , ग़ाज़ियाबाद