तर्पण

आज कर रहे तर्पण 

कितने चाव से 

बना भोजन कितने

साथ ही फल, फूल, खीर,हलवा भी

दान पुण्य में भी कोई कमी नहीं

पर पूछा न हाल कभी

दिया न सम्मान कभी

दुलार कभी

जब थे जीवित आँखों के

सामने

तब तो भाती न थी फूटी

आँख भी कोई बात, सलाह उनकी

न ही उनका बुढ़ापा

दो मीठे बोल को तरस 

जाते थे कान उनके

पड़े तन्हा तन्हा घर के किसी कोने में

कुछ ने तोड़ दिया गम तन्हाई में

कुछ ने तोड़ दिया दम दिन रात के तानों से

कुछ ने दुलार की उम्मीद में

कुछ ने किसी अनाथालय या वृद्धा आश्रम में

फिर ये तर्पण कैसा इतना भव्य

जब दिखा न अनकहा दर्द

न आँसू, न बेबसी जब थे जीवित वो

क्या मिलेगा सुकून उनकी आत्मा 

कर के आज ये तर्पण और महादान , महाभोग

नहीं....बिल्कुल भी नहीं

क्योंकि बिलखती होगी आत्मा और उनकी देख

ये आडंबर....

जीवन भर जो करते प्यार और सेवा मन से मान सम्मान , सद्भावना से 

अपने बुजुर्गों की 

है हक उन का ही यूँ तर्पण का

वरना सिर्फ दिखावे से बढ़कर

कुछ और नहीं कुछ और नहीं

करो न ये पाप ले सिर अपने

   करो प्यार सच्चे मन से 

जब हो साथ वो बन के साया

वरना सब है व्यर्थ एक दिन को यूँ  बना दिवस भर का पर्व

दे नाम तर्पण का।।

....मीनाक्षी सुकुमारन

     नोएडा