अय्यारी

भेष धरे वैरागी का,

ईश के अनुरागी का,

लिये फिरते अभिलिप्सित

उर अय्यारी का।


अतल होकर ये लुढ़कते,

स्वार्थ से सने हैं होते,

भोली सूरत,जवाब नहीं

इनकी फनकारी का


चापलूसी करते और 

हृदय का भेद हैं लेते,

थाह नहीं पा सकता

कोई इनकी अदाकारी का।


शरासन के श्रवण से अनभिज्ञ 

बना लेते हम इन्हें मित्र,

प्रेम के केंचुल में अवगुंठित

रूप लिए विषधारी का।


मत भूलो शांत नदी भी

बन जाती है उष्ण उर्मि,

छल लिया बहुत है तुमने,

अब प्रतीक्षा करो अपनी बारी का।


           रीमा सिन्हा (लखनऊ)