संघर्ष का कारोबार

जब मुझ पर बात आती है तब मुझे पिता 

का दर्द महसूस होता है। जब में हर छोटे बड़े 

काम के लिये अकेले ही संघर्ष करता हूं।तब 

मुझे लगता है मैं संघर्ष का कारोबार करता हूं।


दिन रात गर्मी बारिश और सर्दी बुखार

की भी चिन्ता नहीं करता हूं। परिवार के

सपने पूरे करने के लिये उफ तक नहीं

करता हूं।जब मुझ पर बात आती है तब

मैं पिता के दर्द को महसूस करता हूं।


पिता कभी गुनगुनी धूप हैं तो कभी तीखी

गर्मी की मार हैं।कभी बड़े वृक्ष की छांव हैं 

तो कभी फलों से लदा बाग हैं। समय-समय

पर आसमान से झड़ते पैसों की बरसात है। 


पिता गणित का सवाल है। बचपन से जवानी 

तक समझ में आ गया तो बाकी का जीवन

खुशियों से मालामाल है। और स्वयं संघर्ष करने

के बाद समझ आया तो जीवन भर मलाल है।


 हमारे घर की खुशियां खरीदने के लिए हमारे

 पिता का संघर्ष का कारोबार है। बच्चों का पिता 

उनके लिये संघर्ष करता है चंद खुशियां खरीदने

के लिये इसलिये संघर्ष ही उसका कारोबार है।


ऐसे संघर्ष के कारोबारी पिता को मेरा प्रणाम

और ऐसी संघर्षमयी मातृशक्ति को मेरा बारम्बार

प्रणाम जो अपने दम पर बच्चों और परिवार की 

खुशियों के लिये संघर्ष का कारोबार करती हैं।


रमा निगम वरिष्ठ साहित्यकार 

ramamedia15@gmail.com