रक्षा बंधन

पावन पूज्य प्रेम पर्व है

 बहना के संबल का गर्व है,

 ये अटूट कोमल सा धागा

 सब संबंधों से ऊपर है।

 इस धरती की दो ही खेती

इक ऊसर दूजी है रेती,

 एक हृदय के टुकड़े दोनों

 एक बेटा दूजी है बेटी।

 एक माँ की परछाई दोनों

 प्रेम की सरस लड़ाई दोनों,

 एक दूजे की लौह ढाल बन

 हँसी में छिपी रुलाई दोनों।

 माँ का अमिट रूप बहना है

 पिता का गौरव वंश है भाई,

 दो आँगन की बगिया महके

 दोनों के जीवन की कमाई।

 फले मायका तुझसे मेरा 

 भाभी का श्रृंगार है तू ही,

 शुभ रस्मो की अमरबेल तू

 अंत समय तक प्रथम बटोही।

 मेरी शुभ मंदिर उत्सव का

 प्रथम निमंत्रण,प्रथम शगुन है,

 बंधु-बांधवों की टोली में

 तेरा आगमन मेरा सर्व है।

 श्रावण चंद्र की पूर्ण कला पर

 करूँ तिलक तेरी आरती वारुँ

 अजर अमर बन रहे सलामत

 करूँ टोटके नजर उतारूँ।

 रेशम की डोरी में बंध कर

 रक्षा का मेरी वचन भरे तू,

 धानी धरा पर धनक हो तेरी

 सूर्य चंद्र का दीप सवाँरूँ।


महिमा तिवारी

प्रा. वि. पोखर भिंडा नवीन

 रामपुर कारखाना,-देवरिया