व्यथा

मैं अपनी जड़ों को 

खंडहर कर रही हूँ,

मुझें देखना हैं मेरी 

जड़े कंहा तक है।

कुरेदना हैं उस 

मिट्टी को जिसमे 

पिता का रुदन निहित हैं।

देखना है उस विश्वासघाती 

बीज को जिसने पिता के 

मान को पल में 

धूमिल कर दिया।

स्पर्श करना है उस धूमिल 

नीर को जिसने बून्द बून्द 

सींच मर्यादा की 

जड़ों को सुखा दिया।

मुझे जानना हैं मेरी ज़मी 

कंहा तक है,मुझे जानना हैं 

वो सत्य जो 

सदैव अनछुआ रहा,

मैं सर्वस्व दे कर कैसे पनपित 

होकर भी पतझड़ सी 

निढाल हो गयी,

कैसे छाया देकर भी बबूल 

वृक्ष हो गयी,

कैसे अपनो को फलों से 

पोषित करके भी 

कलंकित हो गयी।

मैं अपनी जड़ों को खोद रही हूँ 

मुझे सत्य की तलाश हैं,

मुझे खुद की तलाश हैं।


डिम्पल राकेश तिवारी

अवध यूनिवर्सिटी चौराहा

अयोध्या-उत्तर प्रदेश