प्रेम आदि अनंत है

हर कोई यहां चाहे प्रेम, हर कोई बाँचे प्रेम।

कभी खिला फूल यह , है कभी कांटें प्रेम।।


प्रेम का नहीं होता कहीं कोई नाम-पता।

प्रेम का नही कोई होता कभी साथी-सखा।

संसार में प्रेम है अनकहा अनोखा बंधन महा।

यह होता कोमल मीठा आदि-अनंत कथा।


प्रेम करना है कठिन हरेक के नहीं  है बस का।

जो चला प्रेम-गली, भोगा दर्द वही सिसका।

इस दर्द की न दवा कोई, प्रेम जिसने कर लिया

प्रेम के हर अहसास को उसने हृदय में भर लिया


सर्वस्व अपना हमने अर्पण उसको कर दिया।

प्रेममय हो राधा ने खुद में कृष्ण को जी लिया।

मीरा की प्रेम-आस्था ने विष को अमृत किया।

जिसने भी किया है प्रेम उसी ने जीवन जिया।



प्रेम को रहने दो अपरिभाषित न कोई नाम दो।

प्रेम सृष्टि का आधार है,आदि-अनंत काम वो।

जन्म-मरण से मुक्त, यही पूजा यही भगवान है।

सकल संसार में व्याप्त, यही प्रकृति विधान है

                

अरुणा कुमारी राजपूत ‘राज’

शिक्षिका (हापुड़- उ०प्र०)