अपना बंधन हे मानव तुम

सामर्थ्य कहां है अंधेरे में 

जो कंचन किरणों को ढक दें, 


सामर्थ्य कहां मेघों में भी 

दृग जल को धूमिल जो कर दे, 


सामर्थ्य कहां है पर्वत में 

जो कर्मवीर को रोक सके,


सामर्थ्य कहां है अंतरिक्ष में 

जो मानव मन को टोक सके।


हे मानव अपना बंधन तुम 

विचार तुम्हें ढक लेते हैं,


तीव्र गतिमान मन के तुरंग

मार्ग अवरुद्ध कर देते हैं।


आओ बढ़कर सघन मेघ सा 

इस अंबर पर तुम छा जाओ,


जय भारत की घोष लगाते

निज दुश्मन से टकरा जाओ, 


आओ बढ़कर मृगराज जैसे 

जीवन विकल शत्रु का कर जाओ, 


आओ बढ़कर हिम शिखरों पर 

ध्वज भारत का लहरा जाओ।।


कवयित्री अंजनी द्विवेदी (काव्या )

जिला देवरिया उत्तर प्रदेश