ढाई आखर प्रेम के

क्यों पूछ रहे हृदय का हाल,

मौन को मेरे पढ़ लो ना तुम।

जो बोल दूँ तो सब सुन लेंगे,

ढाई आखर प्रेम के समझ लो ना तुम।


क्यों कर रहे इधर उधर की बातें,

मूक प्रणय व्यथा जान क्यों नहीं जाते।

कज्जल धार लांघ रहे अब परिधि को,

बुझे स्पन्द में नवजीवन भर दो ना तुम।

ढाई आखर प्रेम के समझ लो ना तुम...


हर तरफ  है मलय बयार,

कलियों पर तरुणाई की बहार।

तेरे साथ चाहती है एकाकिनी फ़ुहार,

मेरे सूने नभ में मोती भर दो ना तुम।

ढाई आखर प्रेम के समझ लो ना तुम...


अधर अवगुंठन बिन खुले ही,

शब्दों को बिन लिखे ही,

तनु को बिन स्पर्श किये ही,

तिमिर मन में किरण भर दो ना तुम।

ढाई आखर प्रेम के समझ लो ना तुम...


                    रीमा सिन्हा(लखनऊ)