मजदूर

क्या खेल रचा तूने 

इस जगत में विधाता,

तेरी माया का मोल 

कोई समझ नहीं पाता।

कोई निकल 

वातानुकूलित कमरों से,

घंटों व्यायामशाला में 

पसीने जलाता।

एक मजबूर मजदूर 

दो रोटी के लिए,

नंगे पांव चिलचिलाती 

धूप में मीलों जाता।

राह तकते आस में 

नन्हे बच्चे दिन भर,

कभी गोधूली तो कभी 

रात में चूल्हा जलता।


शालिनी सिंह,गौरी बाजार-देवरिया,

उत्तर प्रदेश