"तुम्हारे हिस्से का प्यार"

तुम्हारे हिस्से का प्यार,

कब से संभाल कर रखा है।


     अपनी  अतिप्रिय,

      हृदय की संदकुची मे।


कब तुम आओ,

और कब तुम्हें सोंप दूं।


       तुम्हारे हिस्से का प्यार


घर के हर कोने, दीवार पर ,

पसरा है ,तुम्हारा प्यार।


        मै उसे झाढ बुहार कर,

         संजोकर रख देता हूँ तुम्हारे लिये।


तुम्हारे हिस्से के प्यार से,

तुम्हारे होने का अहसास,


            मुझे प्रेरित करता है,

            प्रेमारिंण्य मे विचरने के लिए।


और मेरे हिस्से की नाराजगी भी,

विसार दी है मैंने तुम्हारे लिये।


           तुम्हारे हिस्से का प्रेम

            तुम्हारी हथेली पर रख दूं


और तुम मेरे हिस्से की नाराजगी,

साड़ी के पल्लू की गांठ से खोल

दो प्रिय।

            आओ तुम्हें मेरा प्रेम वुलाता है,

            सुबह सुबह तुलसी का चौवारा भी


तुम्हारी देहरी को ताकता है

और कान लगाकर सुनने का,


             प्रयास करता है ,तुम्हारे

             पैरो के नुपूरो की रुनझुन ।


                       रचियता ~यू.एस.बरी,✍

                     लश्कर, ग्वालियर, म.प्र.

         Udaykushwah037@gmail.com