गिरफ्तारी का औचित्य

एक टीस जिसे देश के करोड़ों लोग महसूस करते रहे हैं, उसके बाबत व्यवस्था देते हुए देश की शीर्ष अदालत ने कहा है कि लोगों को बेवजह इसलिए गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए कि पुलिस को आरोपियों को गिरफ्तार करने का हक है। महज आरोप पत्र दाखिल करने की बाबत होने वाली गिरफ्तारियां लोगों को जीवनभर के लिए त्रास दे जाती हैं। इससे व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा को भी क्षति पहुंचती है। अदालत ने साफ किया है कि यह अनिवार्य नहीं कि हर मामले में गिरफ्तारी जरूरी है। दरअसल, उत्तर प्रदेश में जालसाजी व धोखाधड़ी के एक मामले में सात साल बाद आरोप पत्र दाखिल करने के लिये कुछ व्यक्तियों की गिरफ्तारी की कोशिश में एक व्यक्ति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील की।

 लेकिन राहत न मिलने पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संजय किशन कौल व हृषिकेश रॉय की पीठ ने यह व्यवस्था दी। अदालत का तर्क था कि केवल उन्हीं गंभीर अपराधों में गिरफ्तारी होनी चाहिए, जिसमें अभियुक्त के भागने, सबूतों को नष्ट करने या साक्षियों पर दबाव बनाने की आशंका हो। कोर्ट का मानना था कि पुलिस के गिरफ्तारी के अधिकार और उसके विवेकशील ढंग से प्रयोग करने की स्थिति में अंतर होना चाहिए, जिससे व्यक्ति के मानवाधिकारों की रक्षा भी हो सके। निस्संदेह, शीर्ष अदालत के ये दिशा-निर्देश जहां लाखों लोगों की प्रतिष्ठा की रक्षा करेगें, वहीं जेलों पर पडऩे वाला अनावश्यक दबाव भी कम होगा।

दरअसल, रिपोर्ट में नाम आते ही व्यक्ति की गिरफ्तारी की जरूरत को अदालत ने खारिज किया है। साथ ही कहा है कि इस अधिकार को तब ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए जब कोई और विकल्प शेष न हो। दरअसल, यह स्थिति व्यक्ति को भयाक्रांत तो करती है, वहीं यह मनमाना अधिकार भयादोहन व भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा देता है। रिपोर्टें बताती रही हैं कि बड़ी संख्या में दहेज व अन्य मामलों में झूठे मुकदमे दर्ज होते रहे हैं। कई बार तो गिरफ्तारी से अपनी प्रतिष्ठा बचाने के चक्कर में लोग गलत कदम उठा बैठते हैं। तभी शीर्ष अदालत को कहना पड़ा कि कानूनी अधिकार होने के बावजूद हर मामले में आरोपी को गिरफ्तार करना जरूरी नहीं। 

जरूरत इस बात की भी है कि निचली अदालतें भी इस संबंध में संवेदनशील व्यवहार दिखाएं और गैर जरूरी मामलों में आरोप पत्र दाखिल करने हेतु गिरफ्तारी की अनिवार्यता से परहेज करें ताकि गिरफ्तारी नियम के बजाय अपवाद स्वरूप ही रहे। पुलिस को भी चाहिए कि मामले में सहयोग कर रहे व्यक्ति को गिरफ्तार न करे। उम्मीद की जानी चाहिए कि शीर्ष अदालत की व्यवस्था के बाद पुलिस की मनमानी पर रोक लगेगी, जिसमें निचली अदालतों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। आशा की जानी चाहिए कि शीर्ष अदालत की व्यवस्था के बाद निचली अदालतें नैसर्गिक न्याय की अवधारणा को संबल देंगी। वहीं पुलिस व अन्य जांच एजेंसियां भी अपनी कार्यशैली को लेकर आत्ममंथन करेंगी। बेहतर होगा कि इस तरह की अनावश्यक गिरफ्तारी को कानून के जरिये भी रोका जाये।