उदासी

ना जाने आज ये कैसी उदासी आई है,

हर तरफ ही जैसे वीरानी सी छाई है।


जो कहते थे कभी, उनकी जान हूं मैं,

वही कहते मुझे आज, तु तो पराई है।


नहीं कोई शिकवा-शिकायत किया मैंने,

फिर भी वो क्यों कर रहे हमसे लड़ाई है।


हर पल सी कर होंठ दर्द  सहा किए हम,

फिर भी वो हमें कहते ये तेरी बेवफ़ाई है।


 मार ना डाले ये उदासी हमें संभालो तुम,

हमने  हर अपने से ही तो चोट खाई है।


हम देते हैं प्यार सभी को नहीं समझते

 बेगाना किसी को तो इसमें क्या बुराई है।


बहुत तड़पें हैं तुम बिन अब ना और तरसा,

आ जाओ कि अब प्रेम को तेरी याद आई है।


हर कोई अपना मतलब निकाल कर छोड़ 

देता है, ना जाने ये कैसी रे चली पुरवाई है।


कितना समझाया दिल को हमने ना कर 

मोहब्बत इतनी, अधिक प्रेम जग हंसाई है।


प्रेम बजाज ©®

जगाधरी (यमुनानगर)