बचपन की व्यथा

पहली कक्षा का विद्यार्थी रमन ने अपनी शिक्षिका से पूछा," टीचर जी, वाशरूम जाऊं?"

"जाओ" पांच मिनट बाद ही छुट्टी की घंटी बजी, सबलोग स्कूल से बाहर निकल गए। चपरासी को पता नही क्या जल्दी थी, बाहर से ताला मार दिया, हर क्लास में ताला लगाकर प्रस्थान कर गया।

थोड़ी देर बाद रमन ने जैसे ही दरवाजा खोलने चाहा, वो नही खुला, अब उसे अहसास हुआ, वो टॉयलेट में बंद हो चुका है।

घबराहट से दम घुटने लगा, बहुत चिल्लाया, "खोलो दरवाजा, मैं अंदर हूं, किसी ने नही सुना, चिल्ला चिल्ला कर रो पड़ा बेचारा छोटा सा रमन।  सोचने लगा, कैसे सब मुझे भूल गए, टीचर जी किन खयालो में थी, उनसे पूछकर आया था, अरे मेरा प्यारा दोस्त करण ने भी मुझे नही ढूंढ़ा।

पता नही अब क्या होगा। बस के ड्राइवर और भोलू अंकल भी कैसे निकले, उनको कई बार मैंने चॉकलेट खिलाई। हताश होकर बैठ गया।

3 बजे तक घर नही पहुँचा, तो मम्मी परेशान हुई, स्कूल फ़ोन किया गया, नो रिप्लाई आया।

शाम 7 बजे पापा आफिस से आये, वो भी घबराए, मम्मी पापा दोनों स्कूल आये। गेट पर बहादुर था, उसके साथ जैसे ही स्कूल के गेट के अंदर आये, गेट की खट से अवाज़ हुई और रमन के कान खड़े हो गए, एक छोटी सी दरार से दूर से उसे मम्मी दिखी। वहीं से सारी शक्ति जोड़कर बेचारे ने आवाज़ लगाई.......मम्मी

और एक माँ ने अपने दुलारे की आवाज़ की तरफ रुख किया.......

माँ, बेटे गले लगकर रो रहे थे।

स्वरचित

भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर