आपदा में अवसर

पिछले तीन चार महीनों के दौरान कोविड 19 ने जिस तरह का कहर ढाया है वह शायद ही हम कभी भूल पायेंगे।इसके पहले वेव में मौत की जो खबरें मुझे  मिल रही थीं उससे मेरे  आस पास कोई विशेष प्रभावित नहीं हुआ था हाँ, कुछ मित्रों ने ज़रुर बताया था कि उनके दूर दराज के एक दो रिश्तेदारों  की मौत हुई थी परन्तु दूसरे वेव में  तो मानों मौत का तांडव चल रहा था।जब भी किसी व्हाटसअप के मिलने के संकेत मिलते थे तो रूह काँप जाती थी पता नहीं कब कहाँ से बुरी खबर मिल जाये,प्रतिदिन सुबह आँख खुलते ही किसी न किसी परिचित के संक्रमित होने और उसके एडमिट होने की सूचना मिल जाया करती थी और फिर दिमाग वहीं लगा रहता था।मैं खुद भी घर से तभी बाहर निकलता था जब बहुत ही जरूरी होता था क्योंकि दिल और दिमाग दोनों पर एक मनोवैज्ञानिक दबाब सा मेह्सूस होता था,पता नहीं कही मैं ही इसकी चपेट में ना आ जाउं।उन दिनों सभी लोगों की कोशिश यही थी कि एक दूसरे की हेल्प की जाये और हरेक व्यक्ति अपने अपने स्तर पर कुछ न कुछ करने में लगा था।यह सोच कर मैने भी तीन चार लोगों के साथ मिल कर एक ग्रुप बना लिया और हम सोशल मीडिया के सहारे इस काम को अंजाम देने में पूरी शिद्दत के साथ लग गए थे।हमने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाल रखी थी कि हम देश के किसी भी हिस्से में अस्पताल में दाखिले,ऑक्सीजन/वेंटिलेटर/प्लाज्मा  की ज़रूरत आदि में सहयोग कर सकते हैं और उसका परिणाम यह था कि हमें प्रतिदिन सैंकड़ों की संख्या में फोन काल्स आते थे और हम एरिया के हिसाब से सम्पर्क करना शुरु कर देते।

कई बार हमें सफलता एक बार में ही मिल जाती थी तो कई बार सैंकड़ों काल्स के बाद भी सफलता हमसे कोसोँ दूर होती थी और ऐसे में पेशेंट के रिश्तेदारों के बार बार आने वाले काल्स हमारा ब्लड प्रेशर बढ़ा देते थे।हम उनकी परेशानी समझते थे पर हम भी लाचार हो जाते थे क्योंकि हम लोग तो महज एक सम्पर्क सूत्र के रुप में काम कर रहे थे जहाँ सब कुछ क्षेत्र विशेष के डोनर/समाज सेवी पर ही निर्भर होता था।हमें सबसे ज्यादा तकलीफ होती थी जब हम तमाम प्रयासों के बाद बड़ी मुश्किल से किसी दूर दराज़ के एक पेशेंट के लिए वेंटिलेटर की व्यवस्था करते थे और वह बेचारा एक दो दिन तक जिंदगी और मौत के संघर्ष के बाद दम तोड़ देता था।उस समय हमें ऐसा लगता था कि उसकी मौत के जिम्मेदार हम ही लोग हैं क्योंकि अगर हमने वेंटिलेटर की व्यवस्था जल्दी कर ली होती तो शायद वह ज़रुर बच जाता था।हम मुंबई में बैठे बैठे मृतक के परिजनों को होने वाले दुख का अनुमान लगा कर  पूरी रात सो नहीं पाते थे,और हमें इस त्रासदी से उबरने में हफ्तों लग जाते थे।यह सब कुछ धीरे धीरे हमारी दिनचर्या में शामिल होता जा रहा था और साथ ही साथ  लगभग देश के सभी शहरों तक हमारी संस्था को जानने भी लगे थे।इस काम से जुड़ने के बाद ही मैने महसूस किया था कि वास्तविक खुशी क्या होती है?दूसरों के लिए कुछ करना कितना सुकून देता है।

एक दिन रात के लगभग साढ़े बारह बजे हमें एक मेसज मिला कि उत्तर भारत के एक शहर मेँ एक महिला पेशेंट को प्लाज्मा की ज़रूरत है जिसका ब्लड ग्रुप ओ निगेटिव है ।बस फिर क्या था हम सब अपने अपने सम्पर्क सूत्रों से बातचीत करने में व्यस्त हो गए।सुबह लगभग साढ़े ग्यारह बजे मेरे एक मित्र ने बताया था कि उस शहर के पास वाले दूसरे शहर में  शुभम सिंह नामक व्यक्ति से सम्पर्क किया जा सकता है क्योंकि वो एक महीने पहले कोविड से रिकवर हुए हैं और उनका ब्लड ग्रुप ओ निगेटिव है।जैसे ही मुझे उनका नम्बर मिला मैं उनसे सम्पर्क करने की कोशिश में लग गया,उनका फोन बार बार इन्गेज मिल रहा था आखिर लगभग आधे घंटे तक कोशिश करने के बाद मैने उनके लिए एक मेसेज छोड़ दिया ताकि उन्हें इस बात का एहसास हो सके कि मैं उनसे क्यों सम्पर्क करने की कोशिश कर रहा हूँ।उधर पेशेंट के घर से बार बार फोन आ रहा था और वे जानना चाहते थे कि कोई इन्तेजाम हो पाया है या नहीं,पर एक लम्बे अंतराल के बाद भी जब कोई ज़बाब नहीं मिला तो मैने शाम में फिर से उनसे सम्पर्क करने की कोशिश की।इस बार फोन की घंटी बजी तो सुकून मिला और ऐसा लगा कि ईश्वर ने मेरी गुहार सुन ली है।आखिर बंदे ने फोन उठाया :

-हेलो 

-जी नमस्कार आप कैसे हैं शुभम जी,मैं रोहित कुमार बोल रहा हूँ मुंबई से 

-क्या काम है आपको हमसे(आवाज में थोड़ा रुखापन सा लगा)

-सर हमलोग एक एन जी ओ के लिये काम कर रहे हैं और कोविड संक्रमित पेशेंट की सहायता करने की कोशिश कर रहे हैं।

-हमसे आप क्या चाहते हैं 

-सर हमे जानकारी मिली है कि आप कुछ दिनों पहले कोविड से रिकवर हो गये हैं और आपका ब्लड ग्रुप ओ निगेटिव है 

-आपको किसने बताया

-सर नाम तो मैं नहीं जानता पर आपको भी पता होगा कि इन दिनों कई सेल्फ हेल्प ग्रुप और एन जी ओ ऐसे काम में लगे हुए हैं और सम्बंधित जानकारी सोशल मीडिया पर शेयर करते रहते हैं,बस आपके शहर के ही मेरे एक परिचित ने आपका नम्बर हमें भेजा था।

-अजीब हाल है,हमको इस बात की जानकारी भी नहीं है और हमारा नम्बर भायरल हो गया है,

-सर माफ कीजिएगा इन दिनों जो हालात हैं उनसे हम सभी वाकिफ हैं सर,बस हमारी कोशिश यही है कि ऐसे में हम किसी जरूरतमंद के काम आ जायें,मुझे लगता है आप भी ज़रुर मेरी बात से सहमत होंगे।

-खैर,फिलोसफी छोड़िए काम बताइये सीधे सीधे 

-सर हमें आपके पास के ही शहर के एक कोविड पेशेंट के लिए अर्जेंट प्लाज़मा डोनर चाहिये जिसका ब्लड ग्रुप ओ निगेटिव हो और  चुकी आपका प्रोफाइल इससे मैच करता है इसलिए मेरा आपसे अनुरोध है कि प्लीज आप हैल्प कर दीजिय शायद इससे किसी की जान बच जाये।और आप यह भी जानते ही होंगे कि इससे कोई नुकसान नहीं होता है।

-बॉस पिछले एक हफ्ते में लगभग सौ से ज्यादा फोन मेरे पास आये होंगे,आप लोगों ने तो जीना मुश्किल कर रखा है।ऐसा लगता है कि ब्लड ग्रुप ओ निगेटिव होना ही सब का जड़ हो अरे मैं किसी एक को ही दे सकता हूँ ना भाई सौ को तो  नहीं और सबका  पेशेंट सीरियस ही है 

-सर जी मेरे पेशेंट को ही दे दीजिये बड़ी मेहरबानी होगी 

-बात तो बढ़िया करते हैं आप,अच्छा ई बताइये कि इसमें आपका का फायदा है

-सर जी मेरा क्या फायदा है,मैं तो बस सेवा के लिए कर रहा हूँ 

-बिना मेवा के कोई सेवा नहीं करता सर 

-अरे नहीं सर जी ऐसी कोई बात नहीं है,बस आप हाँ बोल दें तो किसी की जान बच जाएगी।

- बॉस बताईये,आपको पता है कि इन दोनों शहरों के बीच का डिस्टेंस कितना है आप तो ऐसे बोल रहे हैं जैसे कि सब कुछ बगल में हो और आधे घंटे में सब कुछ हो जाएगा,भाई वहाँ जाना पड़ेगा।

-सर मुझे पता है पर पेशेंट के घर वालों ने कहा है कि वे आपके पिक अप और ड्रॉप की व्यवस्था कर देंगे,आपको कोई टेंशन नहीं होगी।

-देखो बॉस हमको रोज ही दस बीस काल आता है,हम खुद भी इससे परेशान हो गए हैं और रोज रोज के इस फोन काल्स के झंझट से निकलना चाहते हैं।

-सर यह झंझट तो नहीं है मेरे हिसाब से फिर भी आप बता दें तो हमलोग जानकारी आगे शेयर कर देंगे।

-देखिये,हमको भी आज लग रहा है कि आचानक ही हम वी आई पी हो गए हैं और हम फुल डिमांड में हैं पर साहब हम अपना खून दे रहे हैं कोई मज़ाक थोड़े ही है इतने दिनों का सब खाया पिया निकल जाएगा और थोड़ा कमजोर भी हो जायेंगे।

-अरे सर जी कोई कमजोरी नहीं होती यह सिर्फ मन का वहम है और यह पूरा प्रोसेस दो घन्टे में हो जाएगा और आप वापस उसी कार से लौट जाइयेगा 

-ए बॉस सबकुछ ठीक है लेकिन एक बात बताईये मेरा इसमें क्या फायदा होगा?

-फायदा?मैने चौंकते हुए पूछा 

-हाँ,फायदा ,कुछ  तो होना चाहिए 

-मैं समझा नहीं पर फिर भी आप बताईये क्या चाहते हैं आप 

-बॉस देखिये मैं इस काम के लिये तीन  लाख लूँगा,एक पार्टी ढाई लाख देने के लिए तैयार है पर अगर आप तीन देंगे तो आपको दे दूँगा,अब आपको सोचना है आगे क्या करना है 

-सर आप क्या बोल रहे हैं,भला प्लाज्मा देने के भी कोई पैसे लेता है और वो भी तीन लाख 

-बॉस इसमें गलत क्या है 

-आपको यह गलत नहीं लग रहा है

-देखिये,हमारे पास न तो टाईम है न ही ज्यादा सोचने के लिए दिमाग है अब आप सोचिये और हमको बता दीजिएगा,यह कह कर उसने फोन काट दिया 

मुझे लगा किसी ने मेरी जुवान काट ली है,मेरे शब्द मेरे हलक में अटक रहे थे मुझे सिर्फ उसकी आवाज सुनाई दे रही थी,,,,तीन लाख लूँगा।


राजेश कुमार सिन्हा 

बान्द्रा (वेस्ट),मुंबई